कठपुतली कलाकार भीमव्वा तोगलु गोम्बेआटा की संरक्षक हैं
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आर्थिक तंगी के बावजूद पारंपरिक विधा को बनाई अपनी पहचान
उन्होंने कर्नाटक की पारंपरिक यक्षगान और तोगलु गोम्बेआटा कला शैली को आज भी जीवित रखा है। वह तोगलु गोम्बेआटा की संरक्षक हैं। इस कला के माध्यम से भीमव्वा 70 वर्ष से अधिक समय से रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों को जीवंत करती आ रही हैं।आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने इस पारंपरिक विधा को छोड़ने की बजाय इसे अपनी पहचान और मिशन बना लिया। भीमव्वा की सबसे खास बात यह है कि वे अपने कठपुतली कार्यक्रमों में सामाजिक संदेशों जैसे स्वच्छता, शिक्षा, नारी सशक्तिकरण आदि को भी पिरोती हैं।