पति सखावत के होते हुए रुकैया को बंगला साहित्य में नाम कमाने का मौका मिल गया था। वह एक लेखक के तौर अपनी रचनाओं के जरिए महिलाएं की बदतर स्थिति पर लिखने लगी थीं। रुकैया का महज 22-23 साल की उम्र में एक लेख प्रकाशित हुआ, 'स्त्री जातिर अबोनति', जिस पर बहुत हंगामा हुआ। इस लेख में महिलाओं की गिरी हुई स्थिति के बारे में लिखा गया था। इसके बाद अंग्रेजी में उनका लघु उपन्यास, 'सुल्तानाज ड्रीम्स' (सुल्ताना के ख्वाब) प्रकाशित हुई। ये उपन्यास मद्रास की एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका 'इंडियन लेडीज मैगजीन' में 1905 में छपा था।
लड़कियों के लिए रुकैया ने खोले स्कूल
महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने लड़कियों की शिक्षा का सपना देखा था। 1910 में रुकैया सखावत ने भागलपुर में लड़कियों स्कूल खोला और 1911 में कोलकाता में स्कूल की शुरुआत की। बंगाल में मुसलमान लड़कियों की शिक्षा के लिए ये दोनों स्कूल वरदान साबित हुए। रुकैया द्वारा स्थापित सखावत मेमोरियल गवर्नमेंट गर्ल्स हाई स्कूल आज भी कोलकाता में चलता है। हालांकि उस दौर में इस स्कूल को चलाने के लिए रुकैया को काफी विरोध का सामना करना पड़ा। 52 साल की उम्र में 9 दिसंबर 1932 को कोलकाता में रुकैया सखावत का निधन हो गया।