मार्शल आर्ट को चुस्ती-फुर्ती का दूसरा नाम कहा जा सकता है। माना जाता रहा है कि इस कला के लिए शरीर का युवा होना आवश्यक होता है, पर केरल का मीनाक्षी अम्मा ने ऐसी सभी धारणाओं को तोड़ते हुए दुनिया के सामने नई मिशाल पेश की है। मीनाक्षी अम्मा कई वर्षों से भारत के सबसे पुराने कलारीपयट्टू युद्ध कौशल की कला नि:शुल्क रूप से बच्चों को सिखा रही हैं। करीब 78 साल की उम्र में जब लोगों के लिए चलना और उठना काफी मुश्किल हो जाता है, उस उम्र में मिनाक्षी अम्मा, देश की अगली पीढ़ी को मार्शल आर्ट के गुण सिखा रही हैं। भारत के सबसे पुराने कलारीपयट्टू युद्ध कौशल को आगे ले जाने और बच्चों को नि:शुल्क इस कला को सिखाने के उनके जज्बे को देखते हुए साल 2017 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित भी किया है।
ईश्वर का वरदान है कलारीपयट्टू
मीनाक्षी अम्मा, कलारीपयट्टू को सिर्फ एक कला ही नहीं वरदान के रूप में भी देखती हैं। मीनाक्षी अम्मा कहती हैं कि मैं 5 साल की थी तभी से कलारी सीख रही हूं। घरवालों ने इस बारे में समर्थन किया, मेरे पिताजी इस कला को ईश्वर का वरदान मानते थे। अब मैं यह कला देश की भविष्य को देना चाहती हूं, ताकि आने वाले वर्षों में भी हमारी संस्कृति जिंदा रह सके। अच्छी बात यह है कि बच्चे भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं। ज्यादातर विद्यार्थियों में औसतन 15-20 साल की लड़कियां हैं।
लड़कियों की आत्मरक्षा के में है मददगार
मीनाक्षी अम्मा कहती हैं कि कलारीपयट्टू, विशेष रूप से देश की लड़कियों को सीखना बहुत आवश्यक है। यह उनकी आत्मरक्षा में मदद कर सकता है। मीनाक्षी गुरुक्कल में सभी को इसीलिए मुफ्त में शिक्षा दी जाती है ताकि बच्चियां बेझिझक खुद के आत्मविश्वास को बढ़ा सकें। यह ऐसी विधा है जो लड़कियों को आगे बढ़ने में मदद करेगा, बिना किसी रोक टोक के।
मीनाक्षी अम्मा की यह कला और इस उम्र में उनकी लगन वास्तव में युवतियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।