करगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना की ओर से दो महिला योद्धा पायलटों ने भी अहम योगदान दिया। इन दो महिला पायलटों ने अपने साहस से जंग को जीत में बदलने में अहम भूमिका निभाई। दोनों महिला योद्धा पायलट हैं- फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन। करगिल दिवस के मौके पर करगिल की चीता पायलट गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन के साहस की कहानी जानिए।
वायुसेना में महिला पायलट
1932 में भारत की वायुसेना अस्तित्व में आई। उस समय तक वायुसेना ब्रिटिशों के अधीन थी। हालांकि आजादी के बाद जब भारतीय वायुसेना ने खुद को दमदार बनाने की कवायद शुरू की। कारगिल युद्ध से पहले तक वायुसेना में महिलाओं को फुल कमीशन नहीं मिलता था। उस समय महिलाएं शॉर्ट सर्विस कमीशन के जरिए महज सात साल ही वायु सेना में कार्य कर सकती थीं। 1994 में भारतीय वायुसेना का पहले बैच तैयार हुआ, जिसमें 25 ट्रेनी पायलटों को शामिल किया गया। गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन उसी बैच में शामिल थीं।
कारगिल महिला योद्धा पायलट गुंजन सक्सेना
फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन सैन्य परिवार से ताल्लुक रखती थीं। 1999 में उन्हें कारगिल युद्ध के जरिए देश की रक्षा का मौका मिला। हालांकि इस के पहले तक उन्होंने कभी फाइटर जेट नहीं उड़ाया था। लेकिन जब पाकिस्तान से जंग शुरू हुई तो वायुसेना में पायलटों की जरूरत पड़ी। गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन को तुरंत कारगिल जंग में शामिल होने के आदेश जारी हुए।
दोनों महिला पायलट तो देश सेवा के लिए एक मौके की तलाश में ही थीं। दोनों युद्ध के दौरान घायल सैनिकों को सीमा से लाने, राशन की सप्लाई करने का काम करती थीं। उनके लिए केवल पहली बार फाइटर जेट उड़ाना चुनौती नहीं थी, बल्कि युद्ध क्षेत्र में पाकिस्तानी पोजीशन पर निगाह रखना और दुश्मन की मिसाइलों से बचते हुए निकलना भी चुनौती थी।
जंग के दौरान गुंजन सक्सेना और श्रीविद्या राजन ऐसे इलाकों से उड़ान भरती थीं, जहां पाकिस्तानी सेना की मिसाइलें तैनात थीं। उनके पास न तो आत्मरक्षा के लिए कुछ था और ना ही बड़े मिसाइलों का सामना करने के लिए उनके हेलिकॉप्टर क्षमतावान थे। उनके पास सिर्फ छोटे चीता हेलीकॉप्टर थे।
Indian Air Force Day 2022: राफेल उड़ाने वाली पहली महिला पायलट के बारे में जानें