एक इंटरव्यू में राधिका ने बताया कि वह अपनी खिड़की से बाहर छलांग लगाने ही वाली थीं कि उनके दोस्तों ने उन्हें रोक लिया। उनकी तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए मनोचिकित्सक के पास ले गए। यहां उनका डिप्रेशन का इलाज हुआ। इलाज के बाद वह नौकरी के लिए फिर से इंटरव्यू देने गईं और इस बार उन्हें मैकेंजी में नौकरी मिल गई।
33 साल में बनी कंपनी की सीईओ
उनके जीवन में बदलाव आना शुरू हुआ। तीन साल बाद जब वह 25 साल की थीं, तो स्वदेश लौट आईं और पति व दोस्त के साथ मिलकर एसेट मैनेजमेंट फर्म की शुरुआत की। इसे बाद में एडलवाइस एमएफ ने अधिग्रहित कर लिया। बाद में राधिका ने एडलवाइज में सीईओ पद के लिए अप्लाई किया और महज 6 महीनों में उन्हें एडलवाइज का सीईओ चुन लिया गया।