पति की मौत के बाद ललिता के जीवन का नया दौर आया। खुद की और बेटी की जिंदगी को संवारने के लिए ए ललिता ने दोबारा शिक्षा शुरू करने के बारे में सोचा। वह अपने पिता और भाईयों की तरह नौ से पांच बजे वाली नौकरी करना चाहती थीं। ताकि काम के साथ अपनी बेटी को भी वक्त दे सकें। इंजीनियरिंग का प्रभाव उनपर बचपन से ही पड़ चुका था, ऐसे में इंजिनियरिंग को अपना लक्ष्य बनाते हुए उन्होंने पढ़ाई शुरू की।
ए ललिता की शिक्षा
परिवार के समर्थन पर ललिता ने मद्रास काॅलेज आफ इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। उस दौरान लड़कियों के लिए इंजीनियरिंग काॅलेज में हाॅस्टल तक नहीं थे। दो और लड़कियों ने इंजीनियरिंग में दाखिला लिया और ललीता समेत तीनों ने हाॅस्टल में रहकर 1943 में अपनी डिग्री हासिल कर ली। इसी के साथ वह भारत की पहली महिला इंजीनियर बन गईं।
ए ललिता का करियर
बाद में ललिता ने बिहार के जमालपुर में रेलवे वर्कशॉप में अप्रेंटिस की। फिर शिमला के सेंट्रल स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया में इंजीनियरिंग असिस्टेंट के पद पर कार्य किया। यूके में लंदन के इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स से ग्रेजुएट शिप एग्जाम भी दिया और अपने पिता के साथ रिसर्च कार्य में भी जुड़ीं।
कई जगहों पर काम करने के साथ ए ललिता भारत के सबसे बड़े भाखड़ा नांगल बांध के लिए जनरेटर प्रोजेक्ट का हिस्सा बनीं। यह उनके सबसे प्रसिद्ध कामों में से एक है। 1964 में पहले इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस आफ वुमन इंजीनियर एंड साइंटिस्ट कार्यक्रम के आयोजन में उन्हें आमंत्रित किया गया। 1979 में 60 साल की उम्र में ए ललिता का निधन हो गया।