दरअसल, शिजी यहां पर एक इंटर्न के रूप में काम कर रही हैं और उन्हें अस्पताल से कोई वेतन नहीं मिलता है और न ही कोई भत्ता। बचपन में ही पिता के गुजर जाने के बाद मां की परवरिश में पली-बढी शिजी एक निजी कॉलेज से बीएससी इन नर्सिंग में पढ़ाई पूरी की हैं। 22 वर्षीय शिजी ने चार महीने एक प्राइवेट अस्पताल में काम किया है। उसके बाद उन्होंने त्रिशूर के इस मेडिकल कॉलेज में पिछले साल जून में दाखिला लिया था। जहां पर ये अपनी सेवाएं दे रही हैं।
इस सरकारी अस्पताल में सेवाएं देना शिजी के लिए एक विकल्प था। जिसे शिजी ने अपना कर्तव्य समझकर चुना है। मेडिकल इमरजेंसी के इस समय में उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला है और वो इस काम को बखूबी पूरा कर रही हैं। वो बताती हैं कि ज्यादातर मरीज बेहोश होते हैं। एक बार उनकी स्थिति में सुधार के बाद उन्हें आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कर दिया जाता है।