फातिमा (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि एक साल की उम्र में पिता को खोने के बाद मां ने हम छह बहनों को अकेले ही पाला। पालन-पोषण के लिए मां कपड़े सिलकर गुजारा करती थी। और हमें पढ़ाती थी। तालिबानी कानून के मुताबिक औरतों को काम करने का अधिकार नही है। इसलिए उसकी दो इंजीनियर बहनों को घर पर बैठना पड़ा। मां के बेटियों को पढाने लिखाने के कारण हर वक्त तालिबानी हमले का डर रहता था। इसलिए मां ने पांच साल तक दिन रात जागकर हम लोगों की रखवाली की।
फातिमा बताती हैं कि जब वो सात साल की थी तो बालों को कटवाकर लड़कों जैसा करवा लिया था। एक दिन जब बाल सही कराने नाई की दुकान पर गई तो कानों की बाली देख उन्हें मेरे लड़की होने पर शक हो गया। नाई ने मुझे भागने का इशारा किया। वहां से भागकर कुएं में कूदकर अपनी जान बचाई। लेकिन तालिबानियों ने मुझे न पकड़ पाने के बाद नाई को मुंह काला कर पूरे बाजार में घुमाया और कोड़े मारे। 2017 में फातिमा इंडियन कॉउंसिल ऑफ कल्चरल रिलेशंस में स्कॉलरशिप हासिल कर दिल्ली आ गई। यहां जाना आजादी क्या होती है। वो भारत में रहकर पीएचडी करना चाहती है लेकिन उसे अपनी मां और बहनों के लिए अपने वतन लौटना ही होगा। फातिमा अपने देश लौटकर नौकरी करना चाहती हैं। साथ ही वो एनजीओ के साथ जुड़कर महिलाओं के हक के लिए लड़ना चाहती हैं और उन्हें हिजाब, बुर्का और चादरी जैसी प्रथा से मुक्त किया जा सके। ये सारे रिवाज उन पर जबरदस्ती थोपें न जाएं।