प्रभु श्रीराम अयोध्या के राजा और दशरथ के पुत्र ही नहीं हैं, वह अगम-अगोचर, जाति, वर्ग से परे हैं। राम को देखने के लिए आंखें होनी चाहिए। मुझे अच्छी तरह याद है , जब बचपन में दादी राम नाम की औषधि से हर रोग-दुख को दूर कर दिया करती थीं। चाहे बुखार हो या सिर दर्द, रामनाम का उपचार सबसे सहज, सरल और विश्वसनीय हुआ करता था। वह राम मेरे जीवन के आधार हैं। वह विविध रूपों में अपनी लीलाओं के जरिए आदर्श स्थापित करने वाले परमात्मा हैं।
वह नर, वानर, आदिवासी, पशु, दानव सभी से करीबी रिश्ता रखते हैं। वह शबरी के जूठे बेर खाकर सामाजिक समरसता का अद्भुत आदर्श प्रस्तुत करते हैं। वह अयोध्या की जनता के लिए नीतिकुशल न्यायप्रिय राजा भी हैं। जब सीता का हरण हुआ तब राम वन में भटकते हुए विलाप करते नजर आते हैं। उनके साथ अयोध्या की प्रतिष्ठा और रघुवंश की साख का सवाल जुड़ गया था। फिर राम ने पिता की आज्ञा का पालन कर पिता-पुत्र के संबंधों को नई ऊंचाई दी।
राम परम योगी हैं। यही वजह है कि वह परम शांति रूपी सीता को धारण करते हैं। रावण कुयोगी था। इसीलिए वह शांति रूपी सीता को कभी प्राप्त नहीं कर सकता था। राम शक्ति के केंद्र होने के बावजूद नीति विरुद्ध काम नहीं करते। राम का हर कदम जनप्रिय और जन ग्राह्य है। उनमें धर्म और व्यवहार की मर्यादा भी और परिवार का बंधन भी समाहित है।
नर हो या वानर, इन सबके प्रति वे अपने कर्तव्यबोध पर सजग रहते हैं। मेरा मानना है कि राम मानवीय करुणा जानते हैं। परहित सरिस धर्म नहीं भाई...इस चौपाई में संत तुलसी यही रामरूपी संदेश देते हैं। राम साध्य हैं, साधन नहीं। गांधी का राम सनातन, अजन्मा और अद्वितीय है। वह दशरथ के पुत्र और अयोध्या का राजा ही नहीं है। मेरी कामना है कि जगत के ऐसे राम सबकी रक्षा करें।
- डॉ. अमिता राधाचार्या, अध्यक्ष-राधा आध्यात्मिक सत्संग समिति-प्रयागराज।