इसी गली में 1990 से रह रहे 92 साल के ज्ञान धनी दास उस रक्तरंजित समय के चश्मदीद रहे हैं। बताते हैं कि 30 अक्तूबर 1990 को विश्व हिंदू परिषद ने विवादित ढांचे पर कारसेवा का एलान किया। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कर्फ्यू लगा रखा था। शहर में हर जगह कारसेवक पकड़े जा रहे थे। सरयू तक जंगल था। उस दिन उसी ओर से सैकड़ों कारसेवक आ गए और इसी गली में इकठ्ठा हो गए।
सभी विवादित ढांचे की ओर जा रहे थे। पुलिस ने यहीं रोका तो कारसेवक गली में ही बैठकर रामभजन करने लगे। पुलिस बल छतों पर भी तैनात था। सुबह 11 बजे से 12 बजे के बीच में अचानक छतों से, नीचे से गोलियां चलने लगीं। देखते ही देखते कुछ मिनट में ही पूरी गली खून से लथपथ हो गई। सरकार तो बताती है कि तीन-चार लोग ही मारे गए, मगर अनगिनत कारसेवक बलिदान हुए। सरयू में प्रवाहित कर दिया गया उन्हें। कई दिन तक संत सरयू स्नान नहीं कर पाए थे। सरयू जी खून से लाल हो गई थीं।
इसी गली में कपड़े की दुकान किए 47 साल के हनुमान प्रसाद मांझी कहते हैं, मैं छोटा था। कारसेवक जुटे तो उनके साथ हो लिया। गली के प्रवेश द्वार से पहले गोलियों की आवाजें सुनाई दीं। मैं दौड़कर घर पहुंचा। देख रहा था कि सैकड़ों कारसेवकों के पैर, पीठ और हाथ में गोलियां लगी थीं। कई ने सड़क पर ही दम तोड़ दिया।
- इसी गली में किराने की दुकान चलाने वाले विपिन कुमार दुबे की उम्र उस समय 12 वर्ष ही रही थी, मगर बहुत कुछ याद है उन्हें। वह कहते हैं कि एक महीना तो प्रतिबंध ही लगा था। शाम को राशन आ जाता था, वही खाते थे। गोलियां चलीं तब वह घर के अंदर थे। गोलियों की आवाजें सुनीं, दोपहर एक बजे तक गोलियों की आवाज आती रही। शाम करीब पांच बजे वह छत से देखने आए थे तो गली खून से लाल थी।
- श्री राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास ने भी इस मंजर को देखा है। वह कहते हैं कि इसे कभी भुला नहीं सकते। कारसेवक तो भजन कर रहे थे और अचानक गोलियां चलने लगीं तो कोई कुछ समझ ही नहीं पाया। कई कारसेवक उस गोलीकांड में बलिदान हुए थे।
कारसेवकों के परिवार भावुक...बोले-गर्व का क्षण, सपरिवार प्राण प्रतिष्ठा में होंगे सम्मिलित
1990 गोलीकांड में कई कारसेवक मारे गए। इसमें अयोध्या के भी तीन कारसेवक थे। पांजीटोला के राजेंद्र धरकार तो महज 16 वर्ष के थे, वहीं रानी बाजार के रमेश पांडेय की जब मौत हुई तो उनके बेटे सुरेश पांडेय सिर्फ एक साल के थे। वासुदेव गुप्ता की मौत के समय बेटी सीमा गुप्ता सात वर्ष की थी। इन परिवारों ने बताया कि बहुत संघर्षों से सभी ने परिवार संभाला। अब सपना साकार हो रहा है तो खुशी है।
भाई की मौत से बिखर गया था सब
कारसेवक राजेंद्र धरकार के भाई रविंद्र धरकार बताते हैं कि भाई की मौत से कुछ दिन पहले ही शादी हुई थी। गौना भी नहीं हो पाया था और उस गोलीकांड में उनकी मौत हो गई। रविंद्र की उम्र उस समय महज आठ साल थी। बताते हैं कि पिता रामाश्रय धरकार टोकरी बनाकर परिवार पालते थे। भाई भी इसी काम में मदद करने लगे थे। 30 अक्तूबर को भी कारसेवा में थे और रामकोट के पास चली गोली में उनकी मौत के बाद पूरा परिवार बिखर गया।
- रविंद्र बताते हैं, भाई की मौत से माता-पिता बीमार रहने लगे। किसी तरह घर की रोटी चली। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी तो मैं भी पढ़ाई नहीं कर पाया और पिताजी के साथ टोकरी बनाने का काम करने लगा। 2008 में माता और 2015 में पिता का निधन हो गया।
- रविंद्र के छह बच्चे हैं। कहते हैं कि पूरे परिवार को राम मंदिर निर्माण की बहुत खुशी है। परिवार को गर्व है कि उनका योगदान इस आंदोलन में रहा।
तब परिवार टूटा...अब सच हो रहा सपना
गायत्री पांडेय बताती हैं, पति रमेश पांडेय हर समय राम मंदिर की बातें करते थे। अब बनेगा, आंदोलन हो रहा है। उस दिन सुबह घर से कारसेवा में शामिल हो गए। कई परिचित कारसेवक भी आए थे तो उन्हें चाय पिलवाई और कारसेवा में शामिल होने चले गए। पुलिस कर्मियों ने जब गोलियां बरसानी शुरू की तो पति अपने साथियों की टोली के साथ कोठी मार्ग पर एक छत पर छिपे थे। यहां भी गोलियां चलीं और उनके सिर में गोली लगी। तीसरे दिन छत पर शव मिला। मेरे चार बेटों में सबसे छोटा सुरेश सिर्फ एक साल का था। पित अकेले कमाने वाले थे। किसी तरह बच्चे बड़े हुए। 2001 में बड़े बेटे ने कारसेवकपुरम स्थित गोशाला में काम करना शुरू किया तो घर की आर्थिक स्थिति सुधरी। बेटे सुरेश पांडेय ने बताया कि विहिप नेता अशोक सिंघल ने पढ़ाई में बहुत मदद की थी। छोटी बहन सुनीता की शादी में भी मदद की। खुशी इसी बात की है कि पिता का सपना साकार हो रहा है।
पिता ने ही खाई थी पहली गोली
कारसेवकों पर जब गोली चली तो पहली गोली वासुदेव गुप्ता को ही लगी थी। बेटी सीमा बताती हैं कि मंदिर आंदोलन को पूरा परिवार समर्पित था। इसीलिए उसके बाद की कारसेवा में वह उनकी मां और भाई भी हिस्सा लेने लगे थे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पिता दुकान चलाते थे। मां की तबीयत बिगड़ी तो वह उनका इलाज नहीं करा पाईं और उनकी भी मौत हो गई। सीमा अभी वही दुकान चला रही हैं। उनका कहना है कि राम मंदिर का निर्माण उनके परिवार के लिए सपना पूरा होने जैसा है। वह उस संघर्ष के दौर से इस उत्सव तक की साक्षी बन रही हैं।