भगवान राम की आंशिक अनुभूति से ही गंगा तट पर क्रियायोग आश्रम की स्थापना हो सकी है। राम की आंशिक अनुभूति के कारण ही पश्चिम बंगाल में रामघाट पर मुझे गुरु रूप में क्रियायोग के संवाहक ज्ञानावतार युक्तेश्वर गिरि जी महाराज से मुलाकात हो सकी।
भगवान राम ने धरती पर अवतरित होकर पुरुषोत्तम रूप में आदर्श और मर्यादा को स्थापित किया है। वह विष्णु के अवतार के रूप में घट-घट व्यापी और जीव जगत के उद्धारक हैं। जब से मुझे होश है तब से मैं विष्णु की शक्ति राम के रूप में अनुभव करता आ रहा हूं। प्रभु श्रीराम के अस्तित्व की यह अनुभूति मेरे जीवन में कभी आंशिक तो कभी गहरी होती रही है।
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भगवान राम की आंशिक अनुभूति से ही गंगा तट पर क्रियायोग आश्रम की स्थापना हो सकी है। राम की आंशिक अनुभूति के कारण ही पश्चिम बंगाल में रामघाट पर मुझे गुरु रूप में क्रियायोग के संवाहक ज्ञानावतार युक्तेश्वर गिरि जी महाराज से मुलाकात हो सकी। इसी के बाद मैं मेडिकल की पढ़ाई छोड़कर पूर्णकालिक उच्चतम क्रियायोग साधना और प्राणायाम के अभ्यास में आ गया।
इसी अदृश्य शक्ति की क्रियाशीलता के कारण ही यूनाइटेड स्टेट अमेरिका ने मुझे शीर्ष स्तर पर सम्मानित ओ-वन वीजा प्रदान किया और मैं वैश्विक स्तर पर क्रियायोग गुरुओं के ज्ञान के प्रकाश का संवाहक बन सका। मेरा मानना है कि क्रियायोग में पूर्णभक्ति विकसित होने पर अनुभव होता है कि पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम सर्वव्यापी हैं।
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कण-कण में व्याप्त हैं। उनके सर्वव्यापी एवं सर्वज्ञ गुणों से दृश्य -अदृश्य जगत का अस्तित्व है। विष्णु अवतार पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को सिर्फ एक जगह पर मानना भगवान में भक्ति का अभाव है। जो लोग भगवान राम को सर्वव्यापी नहीं मानते, उन्हें राम का मंदिर बनाकर पूजा करनी चाहिए।
क्रियायोग में सच्ची भक्ति प्रकट होने पर विष्णु भगवान और उनके प्रतिरूप भगवान राम का दर्शन अपने अस्तित्व एवं बाहर सभी रचनाओं में दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य सभी प्रकार के दु:खों और समस्याओं से मुक्ति पा लेता हैं। - स्वामी योगी सत्यम, संस्थापक -क्रियायोग आश्रम एवं अनुसंधान संस्थान, प्रयागराज।