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Ayodhya Ram Mandir : भारत के शक्ति केंद्र, स्मृति के जागरण की प्राण प्रतिष्ठा; पुनर्जीवित हो रही है मर्यादा

Sat, 20 Jan 2024 06:17 AM IST
दुष्यंत शर्मा तरुण विजय, अयोध्या

सार

हिंदुओं के एक वर्ग या बड़े आचार्यों या हिंदू नामधारी सेकुलरों के हिंदू मंदिर विरोध में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। गजनवी से पुर्तगालियों तक उसका देश और धर्म से विमुख एक स्वार्थी भाव रहा है, जिसे पिछली शताब्दी में लाल, बाल, पाल, विवेकानंद, अरविंद, दयानंद, सावरकर ने बदला और डॉ. हेडगेवार ने उसे एक सैन्य अनुशासन में ढालने का असाधारण व अभूतपूर्व कार्य किया। 
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Ram Mandir - फोटो : Social Media
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विस्तार
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हर काल में हिंदू का राष्ट्र और धर्म के समन्वय से युक्त जागरण कठिन, प्रायः असंभव और जटिल रहा है। ढाई हजार मील दूर अनुल्लेखनीय कस्बे गजनी से एक लुटेरा महमूद प्रभास पाटन आता है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण मंदिर तोड़ता है। इतनी बड़ी संख्या में हिंदू स्त्री और पुरुषों को दास बनाकर ले जाता है कि बगदाद में गुलामों का मूल्य गिर गया। लूट का सामान अलग ले जाता है। मार्ग में सब हिंदू खड़े हुए...सुहेलदेव अपवाद हैं।

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बाकी! कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी का जय सोमनाथ उपन्यास पढ़ा है। उन्होंने उच्च ब्राह्मण कुलोत्पन्न शिव राशि के चरित्र का उल्लेख किया है, जो गजनवी को हिंदू संघ की परमार राजाओं के नेतृत्व में खड़ी सेनाओं से बचाकर सोमनाथ मंदिर के भीतर ले आया था। जीती बाजी हिंदू हार गए। क्रूर व अमानुषिक अत्याचारों के लिए कुख्यात पुर्तगालियों ने गोवा पर चार सौ वर्ष लगातार शासन किया। पणजी में आज भी एक हाथ कातरो खंभ है, जहां उन हिंदुओं के हाथ काटे जाते थे, जिनके घर पर तुलसी का पवित्र पौधा पूजित होता था। उस भयानक काल से गुजरकर अगर आज हिंदू समाज धर्म और राष्ट्र से जुड़ा दिखता है, तो यह आठवां आश्चर्य है। 

हिंदुओं के एक वर्ग या बड़े आचार्यों या हिंदू नामधारी सेकुलरों के हिंदू मंदिर विरोध में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। गजनवी से पुर्तगालियों तक उसका देश और धर्म से विमुख एक स्वार्थी भाव रहा है, जिसे पिछली शताब्दी में लाल, बाल, पाल, विवेकानंद, अरविंद, दयानंद, सावरकर ने बदला और डॉ. हेडगेवार ने उसे एक सैन्य अनुशासन में ढालने का असाधारण व अभूतपूर्व कार्य किया। 
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भाषाई पत्रकारिता का संघर्ष भी रक्त रंजित था
अयोध्या आंदोलन में भाषाई भारतीय पत्रकारिता ने सत्य और जनसंघर्ष का साथ देने की भारी कीमत चुकाई। मैं रामजन्मभूमि आंदोलन के समय पांचजन्य का मुख्य संपादक था। मुलायम सिंह ने घोषित कर दिया था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता। विश्व हिंदू परिषद के सेनापति अशोक सिंघल पांचजन्य का संवाददाता पहचानपत्र बनवाकर गए। गन्ने के खेतों में कारसेवकों ने रात बिताकर अयोध्या प्रवेश का जोखिम उठाया। अंग्रेजी के पत्रकार खुलेआम हिंदू विरोध पर उतर आए थे। वहीं, पांचजन्य, अमर उजाला समेत कई हिंदी अखबारों की अयोध्या की सत्य रिपोर्टिंग के लिए आलोचना करते थे। केवल हिंदी पत्रकारों ने रक्तरंजित अयोध्या की आंखों देखी रिपोर्टिंग करने का साहस दिखाया था। कारसेवकों को इतनी बड़ी संख्या में गिरफ्तार किया गया कि सब्जी मंडी खाली कराकर बाड़े बंदी की गई। आचार्य विष्णुकांत शास्त्री बोले-देखो रामलला का खेल, सब्जी मंडी बन गई जेल।

पुनरुज्जीवित हो रही मर्यादा :
यह भारत की विजय पाने की सुप्त प्रवृत्ति, काल को मात देने वाली जिजीविषा और सामूहिक सांगठनिक शक्ति का ऐसा ऐतिहासिक प्रकटीकरण है, जो धरातल पर आदि शंकर के बाद या राजनीतिक स्तर पर राजाराज चोल, कृष्णदेवराय, उनसे पूर्व विक्रमादित्य, अशोक के बाद कभी संभव हुआ नहीं। दुर्बल, आत्मविस्मृत, समझौतावादी यही पिछले सेकुलर युग में हिंदू की पहचान थी। उस छवि के टूटने और नवीन साहसी निर्भीक हिंदू के उदय से जन्मी वेदना भारत के शत्रुओं को होना स्वाभाविक है। ध्यान रहे राम ने पश्चाताप विहीन रावण युग का अंत किया, पर रावण का कभी अपशब्दों से तिरस्कार नहीं किया, उसका सम्मानजनक अंतिम संस्कार किया। उसके भाई विभीषण का राज्यारोहण करवाया, लंका को अयोध्या में सम्मिलित नहीं किया। आज यही मर्यादा पुनरुज्जीवित होती दिखती है। 

आज चंद्रायण से लेकर मंगल तक की यात्राओं का निर्धारण आस्थावान विश्व विश्रुत भारतीय वैज्ञानिक कर रहे हैं। खेल, चिकित्सा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कठिनतम क्षेत्रों को राजमार्गों से जोड़ता भारत सिंधु-सरस्वती सभ्यता के विराटतम आगार के रूप में विश्व के समक्ष स्वयं को प्रस्तुत करने लगा है। विश्व के संपन्नतम आधुनिकतम स्थानों में हिंदू संस्कृति और सभ्यता के उत्कर्ष को दर्शाते मंदिर सैकड़ों एकड़ों में बन गए हैं, जहां वे लोग भी आकर श्रद्धावनत और विस्मित हो रहें हैं, जो कल तक हमारे अध्यात्म और धरोहर का मजाक उड़ाते थे। इन सब गतिविधियों में 18 से 30 वर्ष का हिंदुस्तानी है। वह भाजपा समर्थक नहीं भी होगा, संघ से सहमत नहीं भी होगा, पर एक नए हिंदुस्तान का अन्वेषण कर रहा है।

अपनी जड़ों की पहचान और पश्चिमी औपनिवेशिक दंभ को करारा और तीखा आहत करनेवाला उत्तर दे रहा है। न्यूयॉर्क के प्रसिद्ध थिंक टैंक के निदेशक ने इस दृश्य को उद्धृत करके मुझसे कहा था-दिस इंडिया इज अनस्टॉपेबल नाउ। सोमनाथ से अयोध्या तक पुनर्निर्माण का पथ भारतवर्ष के सामूहिक स्मृति जागरण का अविजेय, अमर्त्य, शत्रु हनन, सज्जन प्रतिपालक ज्योति पर्व है। अब से भारत एक नया मन, नया कलेवर धारण करने वाला है। अयोध्या में इस शक्ति के ऊर्जा केंद्र की प्राण प्रतिष्ठा हो रही है-मंदिर मात्र की नहीं।

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