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Ram Mandir: जब संतों ने दूसरे पक्ष से मांगी रामजन्मभूमि की भीख... मिला था यह जवाब, जानिए संघर्ष की कहानी

Fri, 19 Jan 2024 08:41 AM IST
आकाश दुबे अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, अयोध्या

सार

संघ परिवार ने जब इसे जनजागरण आंदोलन बनाना शुरू किया, तो कांग्रेस के कान खड़े हुए। सबसे पहले 1985 में अयोध्या-फैजाबाद के लोगों ने बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि समाधान समिति बनाकर बातचीत की। जानिए अयोध्या के संघर्ष की दास्तां।
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अयोध्या राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राममंदिर आंदोलन से जुड़े ऐसे किस्से भी हैं, जो हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। एक जब विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री थे। तब संतों ने दूसरे पक्ष से राम जन्मभूमि की भीख मांगी थी। दूसरा, उससे पहले का है, जब पीएम थे राजीव गांधी और वीर बहादुर सिंह थे प्रदेश के मुख्यमंत्री, जिनके समय जन्मभूमि का ताला खुला था।

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संघ परिवार ने जब इसे जनजागरण आंदोलन बनाना शुरू किया, तो कांग्रेस के कान खड़े हुए। सबसे पहले 1985 में अयोध्या-फैजाबाद के लोगों ने बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि समाधान समिति बनाकर बातचीत की। तय हुआ कि दुबई की तर्ज पर ढांचे को परिक्रमा मार्ग से बाहर किसी जगह स्थानांतरित कर संबंधित स्थान पर मंदिर बन जाए। जैसे ही ये खबरें छपी, बखेड़ा हो गया। वर्ष 1986 में फिर कोशिश हुई। गोरक्षपीठ के महंत अवेद्यनाथ और तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के प्रयास से। वीर बहादुर भी गोरखपुर के थे। उन्हीं के कार्यकाल में ताला खुला था। वे महंत का काफी सम्मान करते थे। इनके प्रयास से अयोध्या गौरव समिति नाम से ट्रस्ट बनाने का फैसला किया गया। इसका अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास और महामंत्री वरिष्ठ पत्रकार स्व. शीतला सिंह को बनाया गया। तत्कालीन सांसद और बाबरी की तरफ से दिल्ली में सक्रिय पैरोकारों में शामिल सैयद शहाबुद्दीन के आवास पर बैठक हुई। इसमें केरल की मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद कोया भी शामिल थे।

एक फोन आया और बात बिगड़ गई
दिल्ली के बाद ट्रस्ट की अयोध्या में दिगंबर अखाड़े में बैठक हुई। इसमें संघ के वरिष्ठ प्रचारक और विहिप नेता अशोक सिंहल तथा दूसरे वरिष्ठ प्रचारक भाऊराव देवरस भी थे। इसमें विवादित ढांचे को 11 फुट ऊंची दीवार से घेरकर राम चबूतरे से मंदिर निर्माण पर सहमति बनी। इसके बाद एक बैठक लखनऊ में हुई, जिसमें हिंदू और मुस्लिम पक्ष से पांच-पांच नाम शामिल कर समझौते के फॉर्मूले पर आगे बढ़ने पर सहमति बनी। भाऊराव देवरस और सिंहल भी सहमत थे। मुस्लिम पक्ष से सैयद शहाबुद्दीन सहित पांच नाम दे दिए गए। उन पर सहमति भी हो गई, लेकिन मंदिर पक्ष से नाम देने के बात आई, तो दूसरे पक्ष से सिर्फ अयोध्या-फैजाबाद के ही लोगों को रखने का दबाव आया। तभी एक फोन आया। देवरस व सिंहल ने बात करने के बाद कहा कि या तो दोनों पक्ष के प्रतिनिधि स्थानीय हों, या मंदिर पक्ष पर भी यह बंदिश न लगाई जाए। बात बिगड़ गई।
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कोई माचिस की डिब्बी है जो दे दें 
अब बात विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल की। जिस दिन दिल्ली में मंदिर व मुस्लिम पक्षकारों के बीच वार्ता हो रही थी, उस दिन शुक्रवार था। वार्ता के दौरान मुस्लिम पक्ष नमाज पढ़ने चले गए। वापस लौटे तो मंदिर पक्ष की तरफ से वार्ता में शामिल स्वामी सत्यमित्रानंद महराज अचानक खड़े हुए और उन्होंने अपने अंगवस्त्र को झोली बनाकर मुस्लिम पक्ष की ओर करते हुए बोले, आपके यहां नमाज के बाद जकात (दान) देने की परंपरा है। आप मुझे जकात दे दीजिए। मैं आप लोगों से जन्मभूमि की भीख मांगता हूं। इतना तो आप भी मानते ही हैं कि अयोध्या हमारे भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है। सत्यमित्रानंद बैठे ही थे कि दूसरे पक्ष से जवाब आया, यह कोई माचिस की डिब्बी है, जो दे दें। वार्ता में शामिल विदेश सेवा के पूर्व नौकरशाह सैयद शहाबुद्दीन ने कहा, यदि सिद्ध हो जाए कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई है, तो मुस्लिम पक्ष अपना दावा छोड़ देगा। पर, अगली बैठक में वह इससे भी पलट गए।
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