सूबे में कई ऐसी जातियां हैं, जिन्हें सियासी तौर पर कमजोर माना जाता रहा है। पूर्वांचल के हर विधानसभा क्षेत्र में इनकी मौजूदगी है, लेकिन इनके मतदाताओं की संख्या कम होने की वजह से सियासी दल अति पिछड़ी श्रेणी में आने वाली इन जातियों को वोट बैंक नहीं मानते। मौजूदा चुनाव में भी ये जातियां सियासी दलों के एजेंडे से बाहर हैं।
इनसे जुड़े मुद्दे पर कोई दल न तो बात करता है और न ही टिकट बंटवारे में ही इन्हें कोई खास तरजीह दी गई। बात दीगर है कि नाई, बिंद, मल्लाह, लोहार, पाल, राजभर, चौहान, काची समेत कई जातियां पूर्वांचल के वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, सोनभद्र, मिर्जापुर आजमगढ़, मऊ, जौनपुर व भदोही आदि जिलों की करीब 40 सीटों केचुनाव परिणामों पर असर डालती रही हैं।
दरअसल पूर्वांचल के कई जिलों में कई ऐसी जातियां हैं, जो न तो संगठित हैं न और न ही इनकी संख्या ही इतनी है कि ये सियासी दलों का ध्यान अपनी ओर खींच सकें। इसका ही नतीजा है कि कोई भी दल चुनावों में इन्हें तरजीह नहीं देता। मौजूदा चुनाव में पिछड़ी जातियों पर तो सभी दलों ने फोकस किया है, लेकिन कम संख्या वाली गोंड, लोहार, कुम्हार, बिंद, मल्लाह जैसी जातियां इनके एजेंडे से बाहर हैं।
इनसे जुड़े मुद्दों को लेकर ही कोई चर्चा नहीं हो रही है। हालांकि विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखें तो इनकी संख्या इतनी है कि अगर बिखराव न हो तो ये चुनाव परिणाम पलट सकते हैं।