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संघ के मंच पर नेहरू की वकालत करने वाले पहले कांग्रेस नेता

सार

खराब सेहत के बावजूद अमर उजाला शब्द सम्मान में आने को हो गए तैयार
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संघ मुख्यालय में प्रणब मुखर्जी - फोटो : PTI
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विस्तार
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हम पत्रकारों के बीच प्रणब दा के नाम से लोकप्रिय पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के लंबे राजनीतिक जीवन में हर एक के साथ उनके कई निजी संस्मरण हैं। उन्हें अगर संजोया जाए तो पूरा एक ग्रंथ बन सकता है। मेरे साथ भी उनके कुछ एसे ही संस्मरण हैं जिनमें प्रणब दा के लंबे राजनीतिक अनुभव के साथ साथ उनकी निजी अभिरुचियों और स्वभाव की झलक भी मिल जाती है।

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प्रणब दा अपने विचारों के इतने पक्के थे कि राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के मंच पर जाकर भी उन्होंने वहां नेहरू की बात की और शायद वह एसे पहले कांग्रेसा नेता थे जिन्होंने संघ को नेहरू के आईडिया ऑफ इंडिया का मतलब समझाया। मैने जब जेएनयू में अपनी पढ़ाई के दौरान पत्रकारिता शुरु की थी, तब भी प्रणब मुखर्जी देश के शीर्ष नेताओं में एक थे। 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद बनी कांग्रेस सरकार में वह नंबर दो की हैसियत वाले मंत्री थे और इसकी उन्हें कीमत भी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद तब चुकानी पड़ी जब मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने उत्तराधिकार के सवाल पर वरिष्ठता का हवाला दे दिया था।

उसके बाद हुआ उनका राजनीतिक वनवास नरसिंह राव ने तब खत्म किया जब उन्हें योजना आयोग का उपाध्यक्ष बनाया। उसके बाद प्रणब दा कांग्रेस की राजनीति में एक महत्वपूर्ण ध्रुव बने रहे और उनकी सियासी यात्रा का चरम देश के राष्ट्रपति पद पर आरुढ़ होने के बाद पूरा हुआ।
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मैने जब राजनीतिक पत्रकारिता शुरु की और कांग्रेस के दफ्तर में मेरा नियमित आना जाना शुरु हुआ तब प्रणब दा पार्टी के उन शीर्ष नेताओं में थे, जिनसे मिलना एक यादगार अनुभव होता था। क्योंकि उनके साथ फालतू के हंसी मजाक ज्यादा नहीं होते थे। हमेशा राजनीतिक चर्चा या किसी वैचारिक मुद्दे पर उनका भाषण नुमा प्रवचन सुनने को मिलता था।बीच में टोकने और संदर्भ से हटकर सवाल पूछने वाले पर वह बहुत जल्दी गुस्सा हो जाते थे और उनका गुस्सा छिपता भी नहीं था।

एक तरह से वह बेहद तुनक मिजाज भी थे, लेकिन उतनी ही जल्दी ठंडे भी हो जाते थे और कई बार जिस पर गुस्सा होते थे, उससे सॉरी कहकर खेद भी व्यक्त कर देते थे। यूपीए सरकार के वित्त मंत्री के रूप में वह जब बजट भाषण खत्म करके संसद परिसर के अपने कक्ष में आते थे तो पत्रकारों से घिर जाते थे। भाषण की थकान के बावजूद वह पत्रकारों के सवालों के जवाब बेहद सहजता और भरोसे से देते थे। लेकिन अगर किसी ने वहां भी कोई उल्टा सीधा सवाल कर दिया तो प्रणब दा डांट लगाने में चूकते नहीं थे।

उनका एक किस्सा तो काफी चर्चित है जब वह वित्त मंत्री थे और अपने कक्ष में बैठे थे तो किसी का फोन उनके मोबाईल पर आ गया। फोन उन्होंने उठाया और बात करते हुई उसे डांटने लगे और फोन काट दिया। जब पत्रकारों ने पूछा कि किसका फोन था, तो हंसते हुए बोले अजीब बात है फाइनेंस मिनिस्टर से पूछ रहा कि लोन चाहिए क्या। जाहिर है कि बैंक के टेलीमार्केटिंग एक्जक्यूटिव का फोन होगा, जिसे नहीं पता होगा कि उसने देश के वित्त मंत्री को ही फोन लगा दिया है।

राजनीति में आकंठ डूबे रहने वाले प्रणब मुखर्जी साहित्य और संगीत के बेहद प्रेमी थे। जब वह राष्ट्रपति थे तो राष्ट्रपति भवन के राजेंद्र सभागार में अक्सर संगीत कार्यक्रम होते थे, जिन्हें वह बेहद मनोयोग और तन्मयता से सुनते थे। राष्ट्रपति भवन में हर साल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर होने वाले चायपान समारोह में प्रणब मुखर्जी के जमाने में स्वादिष्ट बंगाली मिठाइयां अतिथियों को खूब खाने को मिलती रहीं।

उनकी साहित्यिक अभिरुचि की जानकारी मुझे तब ज्यादा हुई जब अमर उजाला के शब्द सम्मान समारोह के मुख्य अतिथि के लिए उन्हें बुलाने का संस्थान ने तय किया। प्रणब दा से मेरे संबंधों को जानते हुए जिम्मेदारी भी मुझे मिली। मैने उनके निजी सचिव अभिजित राय से बात की। अभिजित मेरे मित्र हैं। उन्होंने बताया कि दादा का स्वास्थ्य कुछ गड़बड़ है। इसलिए आ पाएंगे यह कहना मुश्किल है। मैने सोचा कि अभिजित सरकारी अधिकारी हैं, इसलिए टालना चाहते हैं। मैने प्रणब दा की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी जो दिल्ली कांग्रेस की नेता भी हैं, से मुलाकात की और उन्हें शब्द सम्मान और हिंदी व भारतीय भाषाओं के प्रति अमर उजाला के प्रयास के बारे में बताया।

शर्मिष्ठा प्रभावित हुईं फिर उन्होंने अभिजित से बात की और प्रणब दा से मुझे मिलवाने के लिए समय दिलाने को कहा।अभिजित ने मेरा समय तय कराया। मैं उनसे मिला। उनका स्वास्थ्य वाकई ठीक नहीं था। बुखार था और दवाई लेकर वह बैठे थे। फिर जब मैने उन्हें पूरे कार्यक्रम के बारे में बताया और यह बताया कि 2018 के शब्द सम्मान समारोह में हिंदी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठ कालजयी साहित्यकार डा. नामवर सिंह और संस्कृति के लिए जाने माने रंगकर्मी गिरीश कर्नाड को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से और अन्य श्रेणियों में भी जाने माने लेखकों को सम्मानित किया जाएगा।

प्रणब दा ने एक मिनट की देर लगाए बिना कार्यक्रम में आने की मंजूरी दे दी। इसके बाद पूरा कार्यक्रम बेहद गरिमापूर्ण तरीके से तीन मूर्ति सभागार में संपन्न हुआ।उस कार्यक्रम में प्रणब दा ने साहित्य और समाज के संबंधों पर बेहद सारगर्भित भाषण दिया।

मई 2004 की वह शाम मुझे कभी नहीं भूलेगी जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके थे और कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए के गठबंधन की सरकार बनाने की तैयारी हो चुकी थी। कांग्रेस संसदीय दल और यूपीए दोनों ने सोनिया गांधी के अपना नेता चुन लिया था। लेकिन सोनिया के मन में कुछ और था जिसका पता शाम को तब चला जब संसद के केंद्रीय कक्ष में कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में हो रही थी। सोनिया गांधी खुद प्रधानमंत्री न बनने का एलान कर चुकी थीं।

मनमोहन सिंह का नाम चर्चा में आ चुका था। हालाकि दावा प्रणब मुखर्जी का सबसे मजबूत था। बैठक का संचालन खुद प्रणब दा ही कर रहे थे। एक से बढ़कर एक नेता भाषण दे रहे थे और सोनिया गांधी से प्रधानमंत्री पद स्वीकारने की मार्मिक अपीलें कर रहे थे। आखिर में जब सोनिया गांधी ने अपनी जगह मनमोहन सिंह को संसदीय दल का नेता बनाने की अपील की तो पूरा सभागार शोर में डूब गया। कांग्रेसी आंखों में आंसू लिए सोनिया गांधी को मनाने में जुटे थे।

तब प्रणब दा ने भीष्म पितामह की तरह दिल पर पत्थर रखकर सबको शांत किया और अपील की सोनिया जी की बात को सर्वसम्मित से स्वीकार किया जाए। बाद में उन्हें लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल का नेता बनाया गया, क्योंकि मनमोहन सिंह राज्यसभा के सदस्य थे।और दादा ने उसे भी स्वीकार किया। वह प्रधानमंत्री पद के सर्वथा योग्य थे। 2012 में एक बार उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की चर्चा भी चली लेकिन सिर्फ चर्चा ही रही। फिर वह राष्ट्रपति बन गए। वित्त मंत्री रहते हुए प्रणब दा साल में कम से कम एक बार पत्रकारों को दोपहर का भोजन कराते थे।

पूरे समय वह खुद मौजूद रहते थे और एक एक व्यंजन के बारे में बताते थे और पूछते थे कि उसे खाया की नहीं। उनके साथ कांग्रेस, देश और विश्व इतिहास तक पर चर्चा होती थी। विचारों से वह नेहरूवादी थे लेकिन इंदिरा गांधी के अपना सबसे प्रिय नेता मानते थे। हमेशा वह नेहरू और इंदिरा गांधी का नाम लिया करते थे। यहां तक कि जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उन्हें अपने कार्यक्रम में बुलाया जिसे लेकर कांग्रेस में तमाम लोग असहज हो गए, लेकिन प्रणब दा न सिर्फ वहां गए बल्कि उन्होंने संघ के मंच पर खरी खरी सुनाते हुए नेहरू के आईडिया ऑफ इंडिया को सच्ची भारतीयता बताया। बहुत कुछ है लिखने को लेकिन अब प्रणब दा को विनम्र श्रद्धांजलि देने का वक्त है। बाकी फिर कभी।

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