अभियान का आगाज और उसके अगले ही दिन ट्विटर हैंडल पर नरेंद्र मोदी बदलकर हो गए, 'चौकीदार नरेंद्र मोदी'। देखादेखी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पीयूष गोयल समेत कई मंत्री भी 'चौकीदार' हो गए। और अब तो 30 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी, वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए इस अभियान से जुड़े लोगों से चर्चा करेंगे। ये कार्यक्रम देश की 500 जगहों से एक साथ होगा। यानी, 5 बरस में चलते-चलते हम 'चाय' से 'चौकीदार' तक पहुंच गए हैं।
इसी के साथ 2019 के सबसे बड़े संग्राम का सबसे बड़ा चुनावी अभियान औपचारिक तौर पर लॉन्च हो चुका है। ये भाजपा की चुनावी रणनीति के तरकश का एक खास तीर है। जब कोई आप पर पत्थर फेंके तो उससे भी गुलदस्ता बनाने की कोशिश करो। हालांकि, ऐसी कोशिशें हमेशा कामयाबी में ही बदलती हों, ये भी सच नहीं।
बीते कुछ समय में शायद ही कोई रैली हो जिसमें राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी पर हमला करने के लिए 'चौकीदार चोर है' नारे का इस्तेमाल न किया हो। ये नारा अब उनके भाषणों का हिस्सा बन चुका है। वो जनता से आह्वान करते हैं और एक शब्द हवा में उछालते हैं- चौकीदार...जिसके बाद इंतजार होता है उसमें जनता के '...चोर है' जोड़ने का।
राहुल गांधी ने एक नारे को सैकड़ों मंच से सैकड़ों बार दोहराकर भाजपा के खेमे में कुछ तो हलचल मचा ही दी। लेकिन भाजपा ने क्या किया। क्या वो घबरा गई? क्या उसकी बेचैनी उसके नेताओं के बयानों के जरिए बाहर आई।
नहीं। ऐसा नहीं हुआ। बल्कि, भाजपा ने इंतजार किया, ठोस रणनीति पर काम किया और एक अभियान जिस तरह गाजे-बाजे के साथ लॉन्च होता है, वो कर दिखाया।
क्या इससे भाजपा को कोई फायदा भी होगा?
इसका जवाब हां और न दोनों में हो सकता है। यह 2014 के
चाय वाला अभियान की तरह तो बिल्कुल नहीं होने वाला। वो क्यों, इस पर थोड़ी तफसील से बात आगे करेंगे।
लेकिन, मुद्दों के महासंग्राम को भटकाने में ये अभियान जरूर कारगर साबित हो सकता है। कहां किसान और बेरोजगारी के बड़े सवालों का जवाब दिया जाए। क्यों इस सवाल में उलझा जाए कि 2 करोड़ लोगों को हर साल रोजगार के वादे पर अमल नहीं हो पाया। क्यों नोटबंदी और जीएसटी के 'मुर्दों' को कब्र खोदकर बाहर निकलने का मौका दिया जाए।
इस लिहाज से देश भर में बड़े पैमाने पर, बड़ी मशीनरी के साथ 'मैं भी चौकीदार' अभियान के सहारे बाकी मुद्दों पर हावी होने की रणनीति ज्यादा सटीक, ज्यादा फायदेमंद मालूम होती है।