'पार्टियों को गंगा की राजनीति की जगह साफ-सफाई पर भी ध्यान देना चाहिए'
संजीव कहते हैं- प्रियंका गांधी के हाथ से मुद्दा जा चुका है। वह राजनीति में उतरने में विलंब कर चुकी हैं। ऐसे में नाव का पार लगना जरा मुश्किल ही है। यह जरूरी नहीं है कि गंगा की लहर में कांग्रेस की नाव को देखने के लिए खड़ी जनता, मतदाताओं में ही तब्दील हो जाए। संजीव कहते हैं कि यूपी में कांग्रेस की जमीन खिसक चुकी है। वोट बैंक भी कम हो चुका है। पारंपरिक वोट बैंक भारतीय जनता पार्टी के साथ आ चुका है। दलित वोट बैंक बसपा के कब्जे में है। कांग्रेस इस वक्त संकट से घिरी हुई है। उत्तर प्रदेश में मायावती नकार चुकी है। बिहार में लालू नकारने जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में ममता पहले ही नकार चुकी है। वामदल भी कांग्रेस से छिटक चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि गंगा के सहारे ही उनकी नैया पार लग सकती है।
लेकिन, कांग्रेस के लिए हर तरफ से बुरी खबर ही हो, ऐसा भी बिल्कुल नहीं। राजनीति के जानकार गोकुलेश पांडे कहते हैं- "यह अच्छा है कि गंगा राजनीति मुद्दे का केंद्र बिंदु बन रही है। लेकिन सिर्फ सियासी नफे-नुकसान के लिए ही गंगा का राजनीतिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए बल्कि पार्टियों को गंगा सफाई और गंगा संरक्षण की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। वह कहते हैं कि गंगा के जरिए कांग्रेस का जनता के साथ जुड़ाव होगा इसका कोई शक नहीं है। लंबे वक्त से जनता को यह लगने लगा है कि कांग्रेस भारतीय संस्कृति से कटी हुई है- ऐसे में संभव है कि प्रियंका के इस प्रयास के जरिए उनका पुराना वोट बैंक एक बार फिर उसके साथ जुड़ जाए।"