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1967 में पहली बार कांग्रेस के आधिपत्य को मिली थी चुनौती, नेहरू विरोध में बनी पार्टी रही नंबर दो पर

Thu, 14 Mar 2019 08:06 AM IST
Prabudhh Jain ललित फुलारा, चुनाव डेस्क, अमर उजाला
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1967 लोकसभा चुनाव
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52 साल पहले 1967 में चौथा लोकसभा चुनाव हुआ जो भारतीय राजनीति में कई मायनों में अहम रहा। यह पहली बार था जब आजाद भारत में कांग्रेस पार्टी के आधिपत्य को चुनौती मिली थी। 'स्वतंत्र पार्टी' चुनाव के बाद मजबूत विपक्ष के तौर पर उभरी इससे पहले के लोकसभा चुनावों में कोई भी पार्टी विपक्ष की भूमिका में नहीं थी। 'स्वतंत्र पार्टी' का उदय जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी नीतियों के विरोध में हुआ था। नेहरू के दोस्त चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने कांग्रेस से अलग होकर 1959 में 'स्वतंत्र पार्टी' की नींव रखी थी। यह वही दौर था जब कांग्रेस में इंदिरा ने अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली थी। तीसरे लोकसभा चुनाव में स्वतंत्र पार्टी के खाते में महज 18 सीटें आईं। पार्टी ने यह चुनाव नेहरू के खिलाफ लड़ा था। 1966 में इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।

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1967 में 17 फरवरी से 21 फरवरी के बीच चौथा आम चुनाव हुआ। कांग्रेस ने 520 सीटों में से 283 सीटें जीतीं। यह पहली बार था जब कांग्रेस को किसी लोकसभा चुनाव में इतना कम बहुमत मिला था। पार्टी का वोट शेयर भी कम रहा। 


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जनसंघ बनी तीसरी सबसे बड़ी पार्टी
1967 के लोकसभा चुनाव में 'जनसंघ' तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। जनसंघ ने चुनाव में 35 सीटें जीती। जबकि 'स्वतंत्र पार्टी' ने 44 सीटें जीती। 1962 के लोकसभा चुनाव में दोनों ही पार्टियों ने इससे कम सीटें जीती थीं। इस चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर 40.78 फीसदी में ही सिमट गया था। चुनाव में कुल मतदाताओं की भागादारी 61.04 फीसदी रही थी। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने इस चुनाव में 13 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को चौथे लोकसभा चुनाव में तीसरे लोकसभा चुनाव के मुकाबले 78 सीटें कम मिली थीं।
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'स्वतंत्र पार्टी' एकमात्र सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी
1967 के लोकसभा चुनाव में 'स्वतंत्र पार्टी' एकमात्र सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी। इस चुनाव में वामपंथी पार्टियों को झटका लगा। जहां दूसरे लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, वहीं चौथे आम चुनाव में पार्टी चौथे नंबर पर पहुंच गई। सीपीआई उस वक्त दो भागों में टूट गई थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस चुनाव में 109 सीटों पर प्रत्याशी उतारे और सिर्फ 23 सीटें जीतीं। जबकि सीपीएम 59 सीटों पर लड़ी और 19 सीटें जीती। भारतीय जनसंघ ने 249 सीटों पर चौथा लोकसभा चुनाव लड़ा और 35 सीटें जीतीं।


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प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के साथ किया था गठबंधन
चौथे लोकसभा चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की सीटों में तीसरे आम चुनाव के मुकाबले बढ़ोतरी हुई थी। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने इस चुनाव के लिए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के साथ गठबंधन किया था। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का गठन 1964 में हुआ था। यह  पार्टी प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से ही टूटकर बनी थी। चौथे लोकसभा चुनाव के बाद संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी 1972 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में ही मिल गई। चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 13 सीटें और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने 23 सीटें जीती थीं। इस चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियों के 1342 प्रत्याशी मैदान में उतरे थे। इनमें से 440 ने जीत दर्ज की। क्षेत्रीय पार्टियों के 148 प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा और 43 जीते। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद 3 मार्च 1967 को दूसरी बार इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।

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