बूंदी में संकट चौथ पर गणेश मंदिर में लगा मेला।
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घर-परिवार में सुख शांति और बच्चों की लंबी उम्र के साथ कष्ट-बाधाओं को दूर करने की कामना के साथ मंगलवार को संकट चतुर्थी का उपवास रखा जा रहा है। राजस्थान में ज़्यादातर सभी महिलाएं पारंपरिक रूप से यह व्रत रखती हैं। माघ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ने वाले इस व्रत को स्थानीय बोली में सकट चौथ व्रत के नाम से जाना जाता है। बूंदी के गणेश मंदिर में आज संकट चौथ पर मेले का आयोजन भी होता है।
चौथ के इस व्रत में दिनभर निराहार रहकर शाम को भगवान श्री गणेश की पूजा करने और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही महिलाएं भोजन कर उपवास खोलती हैं। चंद्र देव से घर-परिवार और संतान की सुख-शांति की प्रार्थना कर व्रत का पारण किया जाता है।
चतुर्थी तिथि का आरंभ और विशेष योग
10 जनवरी को दोपहर में 12 बजकर 9 मिनट से चतुर्थी तिथि का आरंभ हो रहा है और इसका समापन 11 जनवरी दोपहर दो बजकर 31 मिनट पर होगा। सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह सात बजकर 15 मिनट से नौ बजे तक है।
सकट चौथ पूजा का महत्व
सकट चौथ के व्रत और पूजन का काफी धार्मिक महत्व होता है। इस दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है। हिंदू पंचांग कैलेंडर के अनुसार हर साल माघ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली चतुर्थी तिथि को सकट चौथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सकट चौथ का व्रत और पूजन माताएं अपनी संतान की दीर्घायु और उनके जीवन में कष्टों और बाधाओं को दूर करने की कामना से रखती हैं। इसे वक्रतुण्डी चतुर्थी, माही चौथ और तिलकुटा चौथ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सुबह और शाम दोनों पहर भगवान गणेश की पूजा की जाती है और फिर रात में चंद्रोदय के बाद चांद को अर्घ्य देने के बाद व्रत पारण कर उपवास खोला जाता है।
ये है धार्मिक मान्यता
धार्मिक मान्यता है कि माघ मास में पड़ने वाले सकट चौथ पर भगवान श्री गणेश की पूजा और व्रत करने से भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है और उनकी सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सकट चौथ का व्रत खास तौर पर संतान की दीर्घायु के लिए किया जाता है। वहीं निःसंतान दंपती संतान प्राप्ति हेतु इस व्रत को रखते हैं।