पीएम नरेंद्र मोदी की अपील के बाद राजस्थान भाजपा में इन दिनों वीवीआईपी काफिलों को छोटा करने की राजनीतिक और प्रशासनिक होड़ तेज नजर आ रही है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और राज्यपाल हरिभाऊ बागडे द्वारा अपने-अपने काफिलों में वाहनों की संख्या घटाने के साथ ही सार्वजनिक संदेश भी जारी किए जा रहे हैं। सरकार की ओर से इन कदमों को ईंधन संरक्षण और मितव्ययिता की दिशा में बड़ी पहल के रूप में पेश किया जा रहा है।
राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने अपना कारकेट छोटा कर दिया। सीएम भजनलाल शर्मा कारकेट छोटा करने के बाद अब ईवी में सफर करने लगे हैं। वहीं उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा द्वारा एक कदम आगे बढ़ते हुए रोडवेज बस में सफर करते हुए वीडियो जारी किया और लोगों से तेल बचाने की अपील की लेकिन इस पूरी कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल अब नौकरशाही की कार्यशैली पर उठ रहा है।
सूत्रों के मुताबिक जहां राजनीतिक नेतृत्व काफिले छोटे करने और प्रतीकात्मक संदेश देने में सक्रिय है, वहीं अफसरशाही के स्तर पर अभी भी बड़े काफिलों और सरकारी वाहनों के अनियंत्रित उपयोग की तस्वीरें सामने आती दिख रही हैं।
अफसर मौज में, बिना नियमों के हो रहे टूर
ऑल राजस्थान स्टेट ड्राइवर एंड टेक्निकल एम्प्लॉइज एसोसिएशन ने मुख्य सचिव वी श्रीनिवासन को शिकायत की है कि कई अधिकारी बिना सक्षम अनुमति और अधिकृत टूर प्रोग्राम के सरकारी वाहनों का उपयोग कर रहे हैं। संघ का आरोप है कि नियमों के तहत किसी भी यात्रा से पहले स्वीकृत आदेश अनिवार्य है लेकिन कई मामलों में बिना लिखित अनुमति के वाहन जिले से बाहर और निजी या गैर-आधिकारिक कार्यों के लिए उपयोग किए जा रहे हैं। इससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ बढ़ने के साथ-साथ ईंधन खर्च और वाहन रखरखाव लागत में भी इजाफा हो रहा है।
ये भी पढ़ें: Rajasthan: 'भैरोंसिंह शेखावत की आत्मा को भी हुआ कष्ट', कार्यक्रम में ना बुलाने पर भड़के गहलोत, गरमाई सियासत
सरकारी वाहनों से हर दिन 3500 से 4 हजार लीटर ईंधन खपत
अकेले राजधानी जयपुर में हर दिन करीब 1500 सरकारी वाहन सड़कों पर फर्राटे भरते हैं। इन्हें चलाने के लिए लगभग 4 हजार लीटर ईंधन की खपत होती है। इनमें स्टेट मोटर गैराज पूल के 300 वाहन, जिला पूल के 600 वाहन और विभिन्न कार्यालयों के करीब 500 से 600 वाहन चल रहे हैं।
ड्राइवरों पर दबाव और जवाबदेही का सवाल
संगठन ने यह भी आरोप लगाया है कि कई बार वाहन चालकों पर मौखिक आदेशों के जरिए दबाव बनाया जाता है। ड्राइवरों के अनुसार बिना लिखित आदेश यात्रा कराने पर बाद में बिल पास कराने और जवाबदेही तय करने में दिक्कतें आती हैं, जबकि विरोध करने पर कार्रवाई का डर बना रहता है। सूत्रों के अनुसार कुछ अधिकारी सप्ताहांत और निजी कार्यक्रमों में भी सरकारी वाहनों के उपयोग को लेकर सवालों के घेरे में हैं, जिससे सरकार की फिजूलखर्ची रोकने की नीति पर सवाल उठ रहे हैं।
निगरानी व्यवस्था की मांग तेज
इस पूरे मामले के बाद कर्मचारी संगठन ने सरकार से मांग की है कि सरकारी वाहनों के उपयोग पर सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम लागू किया जाए। साथ ही बिना अनुमति वाहन उपयोग करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है। कुल मिलाकर जहां सरकार शीर्ष स्तर पर सादगी और ईंधन बचत का संदेश देने की कोशिश कर रही है, वहीं जमीनी स्तर पर प्रशासनिक निगरानी और नियमों के पालन को लेकर सवाल उठ रहे इस अभियान की प्रभावशीलता पर गंभीर बहस छेड़ रहे हैं।