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Rajasthan: रणथंभौर में ‘जंगल का युद्ध’! टेरिटरी और बाघिन के लिए खूनी संघर्ष, 9 साल में 9 बाघों की मौत

Sat, 09 May 2026 10:24 AM IST
सवाई ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सवाई माधोपुर

सार

Rajasthan: रणथंभौर टाइगर रिजर्व में क्षमता से अधिक बाघों की मौजूदगी के कारण टेरिटरी और मादा को लेकर बाघों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। पिछले 9 वर्षों में टेरिटोरियल फाइट में 9 से अधिक बाघों की मौत हो चुकी है। विशेषज्ञों ने बाघों के लिए अतिरिक्त आवास और कॉरिडोर विकसित करने की मांग उठाई है।
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यह फोटो रणथंभौर टाइगर रिजर्व की है - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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रणथंभौर में बाघों की स्वच्छंद अठखेलियों को लेकर विश्व स्तर पर अपनी खास पहचान रखने वाला सवाई माधोपुर स्थित प्रदेश का सबसे बड़ा रणथंभौर टाइगर रिजर्व अब बाघों की बढ़ती संख्या के चलते उनके लिए छोटा पड़ने लगा है। अपनी टेरिटरी स्थापित करने के लिए रणथंभौर के बाघ अब एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं और टेरिटरी एवं मादा को लेकर लगातार बाघों के बीच आपसी संघर्ष बढ़ रहा है। यही वजह है कि पिछले 9 वर्षों में रणथंभौर में आपसी संघर्ष में 9 से अधिक बाघों की मौत हो चुकी है, जो वन विभाग, एनटीसीए और वन्यजीव प्रेमियों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है। रणथंभौर में जहां क्षमता से अधिक बाघ होने के चलते टेरिटरी को लेकर संघर्ष बढ़ रहा है, वहीं लिंगानुपात बिगड़ने से मादा को लेकर भी बाघ एक-दूसरे से भिड़ रहे हैं। पेश है रणथंभौर से यह खास रिपोर्ट।
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टाइगर प्रोजेक्ट के बाद बढ़ी बाघों की संख्या
देश में बाघों के संरक्षण को लेकर केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 1973 में टाइगर प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई, जिसके तहत रणथंभौर को टाइगर संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। इसके बाद वर्ष 1980 में रणथंभौर को नेशनल पार्क का दर्जा मिला और 1984 में सवाई मानसिंह सेंचुरी एवं कैलादेवी सेंचुरी को मिलाकर रणथंभौर का दायरा बढ़ाया गया, जो 1334 वर्ग किलोमीटर हो गया। दायरा बढ़ने के साथ ही रणथंभौर में लगातार बाघों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि होती गई। इसके चलते रणथंभौर का क्षेत्रफल और बढ़ाकर वर्तमान में करीब 1700 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया, जिसमें 77 से अधिक बाघ, बाघिन और शावक विचरण कर रहे हैं।

क्षमता से अधिक बाघ बने चिंता का कारण
अच्छे मैनेजमेंट और रखरखाव को लेकर रणथंभौर में लगातार बढ़ती बाघों की संख्या को देखते हुए वर्ष 2015-16 में वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा एक सर्वे किया गया। इस रिपोर्ट में रणथंभौर को क्षेत्रफल के लिहाज से महज 45 से 55 बाघों के रहने के लिए उपयुक्त माना गया था। लेकिन वर्तमान में यहां 77 से अधिक बाघ, बाघिन और शावक मौजूद हैं। ऐसे में बढ़ती संख्या की तुलना में बाघों के लिए जगह कम पड़ने लगी है। यही वजह है कि रणथंभौर देश का सबसे अधिक बाघ घनत्व वाला टाइगर रिजर्व बन चुका है।
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टेरिटरी की लड़ाई में जा रही बाघों की जान
टेरिटरी को लेकर जगह कम पड़ने से रणथंभौर के बाघ अब एक-दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं। अपनी सल्तनत स्थापित करने को लेकर बाघों के बीच आए दिन संघर्ष हो रहा है और इस संघर्ष में कई बार कमजोर बाघ की मौत भी हो जाती है। पिछले 9 वर्षों में टेरिटोरियल फाइट में 9 से अधिक बाघों की मौत हो चुकी है।

टेरिटोरियल फाइट में इन बाघों की हुई मौत
2017 सितंबर – टी-33
2019 जनवरी – टी-85
2020 जनवरी – टी-25
2021 मई – टी-102 का शावक
2022 मई – टी-69 का शावक
2022 नवंबर – टी-42
2024 सितंबर – टी-2312
2024 दिसंबर – टी-2309
2026 अप्रैल – टी-2402

रणथंभौर में बाघों के लिए कम पड़ रही जगह
इन 9 बाघों के अलावा भी कई ऐसे बाघ हैं जिनकी मौत टेरिटोरियल फाइट में हुई, लेकिन वन विभाग के पास उसके पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। वर्तमान में रणथंभौर और कैलादेवी अभयारण्य को मिलाकर कुल 77 बाघ, बाघिन और शावक हैं। कैलादेवी अभयारण्य में करीब 10 बाघ, बाघिन और शावक हैं, जबकि रणथंभौर में 21 बाघ, 20 बाघिन और 16 शावक मौजूद हैं।

एक युवा बाघ को चाहिए 40 वर्ग किलोमीटर
विशेषज्ञों के मुताबिक एक युवा बाघ को अपनी टेरिटरी के लिए कम से कम 40 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चाहिए होता है, जबकि बाघिन को 20 से 60 वर्ग किलोमीटर का इलाका चाहिए। लेकिन रणथंभौर के बाघों को महज 18 से 22 वर्ग किलोमीटर का इलाका ही मिल पा रहा है, जिसके चलते संघर्ष लगातार बढ़ रहा है।

युवा बाघों के कारण बढ़ रहा संघर्ष
रणथंभौर में वर्तमान में 16 से अधिक टाइगर शावक हैं। विशेषज्ञों के अनुसार शावक दो से ढाई वर्ष तक अपनी मां के साथ रहते हैं और उसके बाद उन्हें अपनी खुद की टेरिटरी बनानी होती है। ऐसे में युवा बाघ अपनी टेरिटरी स्थापित करने को लेकर एक-दूसरे से भिड़ रहे हैं। कई बार युवा बाघ कमजोर और बूढ़े बाघों को उनके इलाके से खदेड़ देते हैं और खुद कब्जा जमा लेते हैं।

बाघ-मानव संघर्ष भी बढ़ा
कमजोर और वृद्ध बाघ अपना इलाका छोड़कर रणथंभौर की परिधि से बाहर निकल जाते हैं। ऐसे में ये बाघ आसपास के गांवों और आबादी क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं, जिससे बाघ-मानव संघर्ष की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हो रही है।

विशेषज्ञ बोले- यह प्राकृतिक प्रक्रिया
रणथंभौर के डीएफओ मानस सिंह और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. धर्मेंद्र खांडल का कहना है कि टेरिटरी को लेकर बाघों के बीच संघर्ष वन्यजीवन का प्राकृतिक नियम है। उनका कहना है कि यह स्वस्थ वाइल्डलाइफ की निशानी भी है। हालांकि उन्होंने माना कि रणथंभौर में क्षमता से अधिक बाघ होने के कारण संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं।

मादा को लेकर भी भिड़ रहे बाघ
रणथंभौर टाइगर रिजर्व में बढ़ती आबादी के चलते टेरिटरी के साथ-साथ मादा को लेकर भी बाघों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक एक युवा बाघ की टेरिटरी में सामान्यतः दो से तीन बाघिन होती हैं, लेकिन रणथंभौर में बाघ-बाघिन का लिंगानुपात पूरी तरह बिगड़ चुका है।

बिगड़ा लिंगानुपात बना नई चुनौती
वर्तमान में रणथंभौर में 21 बाघ और 20 बाघिन हैं। ऐसे में एक बाघ को सिर्फ एक ही बाघिन मिल पा रही है। इसी वजह से बाघिनों को लेकर भी बाघों के बीच आए दिन संघर्ष देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति भविष्य में और गंभीर हो सकती है।

सरकार और वन विभाग के सामने बड़ी चुनौती
रणथंभौर वन प्रशासन की मेहनत और बेहतर मैनेजमेंट के चलते बाघों की आबादी लगातार बढ़ रही है, लेकिन अब यही सफलता बाघों के लिए घातक साबित हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द कोई ठोस कार्ययोजना नहीं बनाई गई तो संघर्ष और बढ़ सकता है।

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दायरा बढ़ाने और गांव विस्थापन की मांग
विशेषज्ञों का कहना है कि रणथंभौर का दायरा बढ़ाना होगा और आसपास के गांवों का विस्थापन करना होगा, ताकि बाघों के लिए नया ग्रासलैंड विकसित किया जा सके। साथ ही कैलादेवी कॉरिडोर और रामगढ़ विषधारी-मुकुंदरा कॉरिडोर को भी विकसित करना जरूरी है, ताकि बाघों को पर्याप्त आवास मिल सके।

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