जिले के चौथ का बरवाड़ा कस्बे में स्थित प्रसिद्ध चौथ माता मंदिर में माघ मास की संकष्ट चतुर्थी के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय वार्षिक मेला पूरे परवान पर रहा। सुबह से ही माता के दरबार में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा, जहां दूर-दूर से आए लाखों भक्तों ने माता के दर्शन कर अपने और अपने परिवार की कुशलता की कामना की।
बड़ी चतुर्थी होने के चलते चौथ माता के मंदिर को फूल बंगला झांकी से भव्य रूप से सजाया गया है। मंदिर ट्रस्ट ने माता का आकर्षक शृंगार किया, जिसमें ढाई किलो वजनी स्वर्ण मुकुट और नौ लाख का हार श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहे। सुबह पांच बजे मंगला आरती के साथ छप्पन भोग की झांकी सजाई गई, जिससे भक्तों का उत्साह चरम पर रहा।
मेले में सुरक्षा और व्यवस्थाओं का विशेष ध्यान रखा गया है। पुलिस बल, सीसीटीवी कैमरे, अलग-अलग प्रवेश और निकास द्वार और चिकित्सकीय सेवाओं की पूरी तैयारी है। साथ ही श्रद्धालुओं के लिए भोजन और ठहरने की व्यवस्था भी की गई है। कड़कड़ाती ठंड के बावजूद भक्तों की आस्था ठंड पर भारी दिखाई दी।
इतिहास और आस्था का संगम
चौथ माता मंदिर की स्थापना को लेकर प्रचलित मान्यताओं के अनुसार 1451 में तत्कालीन शासक भीमसिंह ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। 1463 में मंदिर मार्ग पर बिजल की छतरी और पहाड़ी की तलहटी में एक तालाब का निर्माण भी करवाया गया। 16वीं शताब्दी में यह कस्बा चौहान वंश से मुक्त होकर राठौड़ वंश के अधीन आ गया। राठौड़ शासकों ने भी माता के प्रति गहरी आस्था व्यक्त की।
ऐसा कहा जाता है कि 1671 में राठौड़ शासक तेजसिंह राठौड़ ने मुख्य मंदिर के दक्षिणी हिस्से में तिबारा बनवाया। बूंदी राजघराने के समय से चौथ माता को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। करवा चौथ व्रत की परंपरा भी चौथ माता मंदिर से जुड़ी हुई है।
लोककथाओं के अनुसार एक बार युद्ध के दौरान एक महिला ने अपने पति की मृत्यु के बाद सती होने की इच्छा जताई लेकिन राव माधोसिंह ने उसे सती होने से रोका और सती प्रथा पर रोक लगाई। इसके बाद महिला ने माता से गुहार लगाई कि या तो उसे मृत्यु दे दी जाए या उसके पति को जीवनदान मिले। माता ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर उसके पति को जीवनदान दिया। तभी से महिलाएं चौथ माता का व्रत कर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।
चौथ माता के दरबार में हर शुभ कार्य से पहले निमंत्रण देने की प्रथा यहां के लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती है। आज भी चौथ माता के भक्त बड़ी संख्या में यहां पहुंचकर अपनी आस्था और श्रद्धा व्यक्त करते हैं।