अंता विधानसभा सीट पर उपचुनाव के एलान के साथ ही राजस्थान की सियासत में गर्मी बढ़ गई है। उपचुनाव की तारीख तय होते ही कांग्रेस ने दो बार विधायक रह चुके प्रमोद जैन भाया को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। हालांकि, यह उपचुनाव सिर्फ एक सीट के लिए है, लेकिन इसकी जीत या हार का सियासी संदेश काफी दूर तक जाएगा।
भाजपा अभी इस बात पर मंथन कर रही है कि किस चेहरे को टिकट दिया जाए। यह विधानसभा सीट झालावाड़ लोकसभा क्षेत्र में आती है, जो वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत की संसदीय सीट है। वसुंधरा राजे भी इससे पहले सांसद रह चुकी हैं। उन्होंने 1989 में पहला चुनाव लड़ा था और 1991, 1996, 1998 और 1999 में इस लोकसभा सीट से जीत हासिल की। इसके बाद उनके पुत्र दुष्यंत लगातार 5 बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं।
आखिर क्या हैं सियासी मायने?
भाजपा में झालावाड़ की सियासत पूरी तरह वसुंधरा राजे पर निर्भर रहती है। पिछले विधानसभा चुनावों में कंवरलाल मीणा भी वसुंधरा की पसंद से ही उम्मीदवार बने थे और चुनाव जीतने में सफल रहे। बताया जा रहा है कि कंवरलाल मीणा की सजा कम करवाने के लिए भी वसुंधरा राजे ने अपना प्रभाव इस्तेमाल किया था। बताया जाता है कि राजे के कहने पर कंवर लाल मीणा की सजा कम करने के लिए सरकार की ओर से प्रस्ताव तैयार कर राज्यपाल को भी भेजा गया। लेकिन इसी बीच निर्वाचन आयोग ने उपचुनावों का एलान कर दिया। इसका मतलब है कि वसुंधरा राजे सुनी गईं, लेकिन पूरी तरह मानी नहीं गईं।
सवाल: पार्टी वसुंधरा राजे की सहमति लेंगी या नहीं
अब देखना यह है कि भाजपा उपचुनावों के लिए टिकट घोषित करने में वसुंधरा राजे की सहमति लेंगी या नहीं। वहीं, कांग्रेस के प्रत्याशी प्रमोद जैन भाया इस सीट के मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। वे दो बार गहलोत सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। ऐसे में भाजपा को भी यहां पूरी ताकत से चुनाव लड़ना होगा। संभावना है कि वसुंधरा राजे कंवरलाल मीणा के परिवार या अपने समर्थक प्रभुलाल सैनी में से किसी को टिकट दे सकती हैं, क्योंकि वे पहले भी यहां विधायक रह चुके हैं।
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सक्रियता से सियासत फिर हुई तेज
हालांकि, बीते लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वसुंधरा राजे का राजनीतिक मंचों पर कम ही प्रभाव नजर आया। लेकिन पिछले कुछ महीनों में उनके राजस्थान दौरे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांसवाड़ा में उनके साथ सहज बातचीत को देखकर लगता है कि बीजेपी में उनका ‘वनवास काल’ खत्म हो चुका है और अब वे फिर से पार्टी में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
जानकारों के बोल...
वरिष्ठ पत्रकार नारायण बाहरेठ का कहना है कि इस एक सीट के जीतने या हारने से बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन भाजपा जिस रास्ते पर जा रही है, उसमें पुराने स्थापित नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है। अगर टिकट बंटवारे में वसुंधरा राजे की सहमति ली भी जाएगी तो इसके लिए पार्टी उनसे कई समझौते करवाएगी।