बेनीवाल वसुंधरा के बहुत बड़े आलोचक रहे हैं। साल 2018 में विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा छोड़ कर नई पार्टी गठित कर ली थी। वसुंधरा और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के बीच साल 2018 में राजस्थान भाजपा अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर मतभेद उभरे थे। दो महीने से भी अधिक की देरी के बाद प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर मदन लाल सैनी के नाम पर सहमति बनी थी।
राज्य विधानसभा के पिछले चुनाव में पार्टी की हार के बाद वसुंधरा को भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया था। शेखावत ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री द्वारा विधायकों को जैसलमेर ले जाना दर्शाता है कि उन्हें अपने विधायकों पर भरोसा नहीं है और सरकार अल्पमत में है। उन्होंने दावा किया कि 2018 में कांग्रेस के राज्य की सत्ता में आने के बाद राज्य सरकार में 'सीधे दो फाड़' हो गया था।
उन्होंने कहा, 'जब खुद मुख्यमंत्री ने ये कहा कि उनकी सचिन से डेढ़ साल में कोई बातचीत नहीं हुई है, तो यह स्थिति अपने आप सारी कहानी बयां करती है।' केंद्रीय जलशक्ति मंत्री शेखावत ने कहा, 'विधायकों को जैसलमेर में एक किले में ले जाना साफ बताता है कि मुख्यमंत्री अपने विधायकों पर भरोसा नहीं करते। कोरोना संकट का समाधान निकालने की बजाय वह अपना घर ठीक करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मौजूदा परिस्थिति यह भी दर्शाती है कि सरकार अल्पमत में है।'
उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य ये है कि कांग्रेस की अंदरूनी कलह के चलते प्रदेश की मासूम जनता को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। शेखावत दूसरी बार जोधपुर से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे हैं। उन्होंने साल 1992 में जोधपुर विश्वविद्यालय से एक छात्र नेता के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित कई संगठनों से भी जुड़े रहे हैं।
साल 1993 के विधानसभा चुनाव में शेखावत ने भाजपा के दिवंगत नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत के साथ निकटता से काम किया। राजस्थान के सीमाई इलाकों में काम करने वाली संघ समर्थित सीमा जन कल्याण समिति के महासचिव के रूप में उनके काम की सराहना हुई और यहीं से उनकी एक पहचान बनी।