यूं देखा जाए तो राजस्थान में लड़ाई हमेशा भाजपा और कांग्रेस के बीच ही रही है। ये दोतरफा मुकाबला होता है जहां किसी तीसरे पक्ष की मजबूत मौजूदगी नदारद रही है। लेकिन साल 2008 यहां के नेताओं को याद रहता है।
तब बहुजन समाज पार्टी ने कमाल का प्रदर्शन किया था। सूबे के 7.66 फीसदी वोटों पर पार्टी ने कब्जा जमाया और 200 सीटों वाली विधानसभा में अपने 6 विधायक भेजे। नवलगढ़ से राजकुमार शर्मा, बाड़ी से गिर्राज सिंह, मलिंगा और उदयपुरवाटी से राजेंद्र गुढ़ा, सपोटरा से रमेश मीणा, गंगापुर से रामकेश मीणा और दौसा से मुरारीलाल मीणा ने जीत हासिल की थी।
जब अशोक गहलोत को मिली बड़ी राहत
2008 के चुनावी नतीजों में कांग्रेस को 96 और भाजपा को 78 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए 100 सीट का आंकड़ा पार करना था। बसपा के सभी 6 विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए। उन्हें गहलोत सरकार में मंत्री भी बनाया गया। शायद, राजस्थान की जनता को ये रास नहीं आया। साल 2013 में जनता ने इसका जवाब ईवीएम पर बटन दबाकर दिया। पिछले चुनाव में बसपा के वोट प्रतिशत में जबर्दस्त गिरावट देखने को मिली। ये खिसककर 3.44 फीसदी पर आ गया।
बसपा ने संघर्ष करना नहीं छोड़ा
2013 के चुनाव में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के करीबी मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ के दबदबे वाले चूरू की सादुलपुर और झुंझनू की खेतड़ी में बसपा ने जीत हासिल की थी। इसके अलावा सीएम के असर वाले धौलपुर में विधायक की हत्या के मामले में जेल होने के कारण हुए उपचुनाव में भी सीट बसपा के खाते में गई।
इस बार बसपा ने 191 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। सादुलपुर और खेतड़ी में मौजूदा विधायकों को टिकट दिया गया है। वहीं अलवर की तिजारा सीट से भाजपा के बागी संदीप और आमेर सीट से नेशनल पीपल्स पार्टी से बसपा में शामिल हुए नवीन पिलानिया को टिकट मिला है। मायावती भी प्रचार में जुटी हैं। लड़ाई वाकई दिलचस्प हो चुकी है।