वसुंधरा राजे का सियासी सफर परवान चढ़ता रहा और जल्द ही उनकी राज्य की राजनीति में वापसी हुई। राजस्थान के बड़े नेता भैरो सिंह शेखावत जब उपराष्ट्रपति बने तो वसुंधरा को राजस्थान भाजपा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। भाजपा ने वसुंधरा राजे को 2003 में राजस्थान के सीएम पद की कमान सौंपी। वह राजस्थान की पहली महिला सीएम बनीं। 2013 में भी उन्होंने सीएम पद की कमान संभाली। इस बार भी भाजपा ने उन्हीं पर दांव लगाया है।
वह पहली बार 1985 में धौलपुर से विधायक चुनी गईं। 2003-08, 2008-13 और 2013 से 14वीं विधानसभा में झालरापाटन से विधायक रहीं। इस बार भी वसुंधरा राजे इसी सीट से चुनाव लड़ रही हैं। इसके अलावा वह पांच पर सांसद भी रहीं। वह 9वीं लोकसभा में 1989-91, 10वीं लोकसभा में 1991-96, 11वीं लोकसभा में 1996-98, 12वीं लोकसभा में 1998-99 और 13वीं लोकसभा में 1999-03 तक सांसद रहीं। 2003 में राजस्थान का सीएम बनने के बाद से वह यहीं की होकर रह गईं और भाजपा का झंडा मजबूती से थामे हुए हैं।
वसुंधरा राजे की छवि एक आक्रामक नेता के तौर पर रही है जो न सिर्फ विपक्ष पर करारा हमला बोलती हैं बल्कि पार्टी के भीतर भी अपनी बात मजबूती से रखती हैं। अक्सर मीडिया में ऐसी खबरें आई हैं कि उन्होंने हाईकमान को अपने बातें मनवाई हैं। पिछले कुछ समय में दिल्ली में हाईकामान के साथ लगातार उनकी बैठकों से इस चर्चा को बल मिला था कि कुछ खटपट चल रही है, लेकिन हर बार वसुंधरा राजे किसी विजेता की तरह बाहर निकलीं।
चाहे बात प्रदेश अध्यक्ष को बनाए रखने की हो या अपने करीबियों को टिकट देने की, वह हर बार विजेता ही साबित हुई हैं। संघ के साथ भी उनके मनमुटाव की खबरें आईं, लेकिन उनकी सत्ता कायम रही। हालांकि, इस बार राजस्थान में कई मंत्रियों और विधायकों के टिकट काटे गए हैं, उससे पता चलता है कि टिकट वितरण में उनका बहुत ज्यादा दखल नहीं रह पाया।
बहरहाल, वसुंधरा राजे के सामने इस बार बेहद मुश्किल चुनौती है। राज्य में भाजपा से लोगों की नाराजगी साफ नजर आती है। कई मुद्दों को लेकर राजपूत समाज भी उनसे नाराज नजर आ रहा है। वसुंधरा के सामने इन्हें मनाने की चुनौती भी है। उन्हें इस भ्रम को तोड़ना है कि राजस्थान में सरकार की वापसी नहीं होती। अगर वह इस बार भाजपा की वापसी करवा देती हैं तो उनका नाम राजस्थान के इतिहास में अमर हो जाएगा।