राजस्थान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट हैं। इसके बरक्स भाजपा में मदन लाल सैनी अध्यक्ष बनाए गए हैं। पायलट केन्द्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं। सांसद के तौर पर भी उनका अनुभव शानदार रहा है। पिछले तीन साल से वह राजस्थान में फ्रंट लाइन की राजनीति कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ सैनी संगठन के नेता हैं। संघ के कार्यकर्ता के रुप में जाने जाते हैं।
राजस्थान में शेखावटी अंचल में भाजपा को खड़ा करने वालों में जाने जाते हैं। अभी तक वह राजस्थान किसान मोर्चा की जिम्मेदारी और पार्टी के अनुशासन समिति का कामकाज देखते रहे। भारतीय मजदूर संघ के लिए काम किया है। तीन महीने पहले राज्यसभा सांसद बने हैं, लेकिन राजनीतिक मामलों में निर्णयक अनुभव कम है। भाजपा के नेता भी मान रहे हैं सैनी मजबूरी के प्रदेश अध्यक्ष हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की तुलना में सैनी को अपनी राजनीतिक योग्यता साबित करनी है।
गहलोत बनाम सैनी
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत माली समाज से आते हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सैनी भी इसी समाज से हैं। लेकिन अशोक गहलोत ने राजस्थान की राजनीति में मजबूत पकड़ बना ली है। गहलोत को माली समाज के अलावा अन्य सभी जातियों, वर्गों को साधने का अनुभव रहा है। वह कांग्रेस के राज्य में सर्वमान्य नेता माने जाते हैं। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की दौड़ में शामिल एक केन्द्रीय नेता के अनुसार मदल लाल सैनी काफी मजबूत और परिवर्तनकारी अध्यक्ष साबित होंगे, लेकिन अशोक गहलोत से उनकी तुलना नहीं की जा सकती।
वुसंधरा राजे ने राज्य में प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किए जाने को लेकर जमकर अपनी ताकत दिखाई। यही वजह रही कि 16 अप्रैल 18 को अपने पद से इस्तीफा दे चुके अशोक परनामी का विकल्प तलाशने में भाजपा को 72 दिनों का समय लेना पड़ा। तीन-चार बार उच्च स्तरीय बैठक हुई।
दो से तीन बार भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, संगठन मंत्री राम लाल और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बीच आमने-सामने की बैठक हुई। इतना ही नहीं प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव में राजस्थान के आला भाजपा नेताओं से लेकर संघ से जुड़े प्रचारक और नेताओं को भी आगे आना पड़ा। सूत्र बताते हैं कि सैनी के नाम को तय करने से पहले संगठन मंत्री राम लाल ने वसुंधरा की सहमति का पूरा इंतजार किया। इसके बाद ही उनके नाम पर मुहर लग पाई।
सैनी के बहाने वसुंधरा ने कई निशाने साधे हैं। अलवर, अजमेर समेत तीन सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। बताते हैं उपचुनाव के दौरान संघ के वसुंधरा से नाराज नेताओं ने प्रचार में कोई सहयोग नहीं दिया था। यहां तक कि नतीजे आने के बाद सत्ता पक्ष के लोगों ने मिठाइयां भी बांटी थी। हार को ही आधार बनाकर वसुंधरा के प्रिय अशोक परनामी का भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व ने इस्तीफा ले लिया था। लेकिन अब संघ की पृष्ठभूमि का ही व्यक्ति भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष है।
वसुंधरा ने राजस्थान में गजेन्द्र सिंह शेखावत के रूप में भौरों सिंह शेखावत के युग की वापसी और भाजपाई राजनीति में राजपूत वर्चस्व कायम होने से रोंक दिया। केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल के भाजपा अध्यक्ष न बन पाने में भी वसुंधरा की भूमिका थी। वह किरोड़ी लाल मीणा को भाजपा में ले आई और भूपेन्द्र यादव, श्रींचंद कृपलानी जैसे चर्चा में आए नामों को लेकर अपने रुख पर अड़ी रही। इस तरह से वसुंधरा ने राज्यों में अपने विरोधियों को आईना दिखाते हुए सारे कील-कांटे हटाए, वहीं संदेश भी दे दिया कि झुकना उन्हें मंजूर नहीं। राज्य का एक मात्र दमदार चेहरा बनकर रह गई।
संघ की बढ़ी पूछ
राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष वह भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सक्रिय सदस्य। बड़ी बात है। फिलहाल इसकी संभावना कम क्या न के बराबर थी। माना यह जा रहा था कि राजस्थान का नया अध्यक्ष विशुद्ध रूप से भाजपा की पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति होगा। लेकिन सैनी के बहाने संघ की पूछ बढ़ गई।
संघ की पृष्ठभूमि के नेता सक्रिय राजनीति में उभरने लगे हैं। हालांकि जहां जहां भाजपा की सरकार बन रही है, वहां संघ से जुड़े नेताओं को मंत्रियों, उनके सचिवालयों तथा सांसदों के साथ बड़े पैमाने पर जोड़ा गया है। यह प्रयास लगातार जारी है। केन्द्र सरकार में भी संघ से जुड़े लोग सक्रिय हैं। लेकिन अब वह सक्रिय राजनीति में भी अपनी पैठ बढ़ा रहे हैं।