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यमुना जल समझौता: 32 साल बाद राजस्थान के लिए खुला यमुना का रास्ता, जानें समझौते से लेकर सियासत तक पूरी कहानी

Wed, 01 Jul 2026 10:14 AM IST
प्रिया वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

यमुना नदी के जल बंटवारे को लेकर राजस्थान और हरियाणा के बीच हुए नए समझौते ने तीन दशक पुरानी उम्मीदों को नई दिशा दी है। जहां सरकार इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है, वहीं कांग्रेस समझौते की शर्तों को सार्वजनिक करने की मांग कर रही है।
 
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यमुना जल बंटवारे को लेकर राजस्थान और हरियाणा के बीच हुआ समझौता - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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तीन दशकों के लंबे इंतजार और कई प्रशासनिक पड़ावों से गुजरने के बाद आखिरकार यमुना नदी के जल बंटवारे को लेकर राजस्थान और हरियाणा के बीच एक नया और ऐतिहासिक अध्याय शुरू हो गया है। सोमवार को नई दिल्ली के कर्तव्य भवन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में दोनों राज्यों के बीच एक महत्वपूर्ण मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (MoA) पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते से जहां राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र (चूरू, सीकर और झुंझुनूं) की दशकों पुरानी प्यास बुझने की उम्मीद जगी है, वहीं इस पर प्रदेश में सियासत भी गरमा गई है। पेश है यमुना जल समझौते का पूरा इतिहास, नया प्रशासनिक ढांचा और इस पर हो रही राजनीति की मुकम्मल रिपोर्ट।

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1994: यमुना जल बंटवारे की ऐतिहासिक शुरुआत
लंबे समय तक चले विवादों के बाद 12 मई 1994 को हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली (एनसीटी) के बीच यमुना जल बंटवारे को लेकर ऐतिहासिक समझौता (MoU) हुआ। इसमें तय किया गया कि यमुना नदी के उपयोग योग्य जल का बंटवारा सभी राज्यों की जरूरतों के अनुसार किया जाएगा।

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तीन दशक पुरानी उम्मीदों को मिली नई दिशा - फोटो : अमर उजाला
1995: बोर्ड और समीक्षा समिति का गठन
इस समझौते को लागू करने और राज्यों के बीच समन्वय बनाए रखने के लिए 11 मार्च 1995 को केंद्र सरकार के जल संसाधन मंत्रालय ने दो प्रमुख निकायों का गठन किया—
  • अपर यमुना रिवर बोर्ड (UYRB): राज्यों को निर्धारित मात्रा में पानी उपलब्ध कराना और जल प्रवाह का नियमन करना।
  • अपर यमुना रिविजन कमेटी (UYRC): केंद्रीय जल मंत्री की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति, जिसमें संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री सदस्य होते हैं। यह समिति बोर्ड के कार्यों की समीक्षा करती है और महत्वपूर्ण निर्णय लेती है।
2000-2001: उत्तराखंड की एंट्री
उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड राज्य बनने के बाद नवंबर 2000 में उसके मुख्यमंत्री को समीक्षा समिति में शामिल किया गया। वर्ष 2001 में अपर यमुना रिवर बोर्ड में भी उत्तराखंड के प्रतिनिधि को स्थान दिया गया। हालांकि उत्तर प्रदेश के हिस्से से उत्तराखंड को मिलने वाले जल हिस्से का अंतिम निर्धारण अब भी केंद्र सरकार के विचाराधीन है।

राजस्थान को मिला यमुना जल में हिस्सा - फोटो : अमर उजाला
प्रशासनिक ढांचा कैसे काम करता है?
पूरी व्यवस्था की निगरानी केंद्रीय जल आयोग (CWC) के एक सदस्य द्वारा की जाती है, जो बोर्ड के पार्ट-टाइम चेयरमैन होते हैं। पांचों राज्यों के मुख्य अभियंता (Chief Engineer) स्तर के अधिकारी इसके सदस्य होते हैं। इसके अलावा प्रदूषण नियंत्रण, भूजल और विद्युत क्षेत्र के केंद्रीय विशेषज्ञ भी इसमें शामिल रहते हैं। रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त पूर्णकालिक सदस्य-सचिव (Member Secretary) के पास होती है।

2012: राजस्थान को मिला यमुना जल में हिस्सा
वर्ष 2012 में केंद्र सरकार ने राजस्थान को भी यमुना नदी के पानी में हिस्सा देने पर सहमति दी। हालांकि उस समय पानी को राजस्थान तक पहुंचाने के लिए आवश्यक पाइपलाइन और अन्य आधारभूत ढांचा तैयार नहीं होने के कारण योजना धरातल पर नहीं उतर सकी।

1994 समझौते के अनुसार वार्षिक जल आवंटन

कुल उपयोग योग्य जल: 11.983 BCM (बिलियन क्यूबिक मीटर)
  • हरियाणा – 5.730 BCM
  • उत्तर प्रदेश – 4.032 BCM
  • राजस्थान – 1.119 BCM
  • दिल्ली – 0.724 BCM
  • हिमाचल प्रदेश – 0.378 BCM
बाद में 6 जुलाई 2012 को अपर यमुना रिवर बोर्ड की 42वीं बैठक में जल उपलब्धता के अनुसार चार-चार महीने के तीन सीजन के आधार पर जल वितरण की नई व्यवस्था भी स्वीकृत की गई।

पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित होगी - फोटो : अमर उजाला
2026 का नया MoA: 34,102 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी परियोजना

1994 में हिस्सेदारी मिलने के बावजूद राजस्थान अपने हिस्से का पानी नहीं ला पाया था। अब नए MoA के बाद इस दिशा में बड़ा रास्ता साफ हुआ है। फरवरी 2024 में राजस्थान और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों के बीच प्रारंभिक समझौता (MoU) हुआ। जून 2026 में परियोजना के क्रियान्वयन की रूपरेखा तैयार हुई और 29 जून 2026 को अंतिम MoA पर हस्ताक्षर किए गए।

परियोजना की मुख्य बातें
कुल लागत: लगभग 34,102 करोड़ रुपये
  • 295.5 किलोमीटर लंबी भूमिगत पाइपलाइन हथिनीकुंड बैराज से चूरू जिले के हंसियावास जलाशय तक बिछाई जाएगी।
  • तीन भूमिगत पाइपलाइन, निरीक्षण सड़क, कृत्रिम जलाशय तथा आधुनिक जल प्रबंधन प्रणाली विकसित की जाएगी।
  • इससे राजस्थान के चूरू, सीकर, झुंझुनूं और भरतपुर क्षेत्र को पेयजल और सिंचाई के लिए लाभ मिलेगा।
  • हरियाणा के भी 10 स्थानों पर पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित होगी।
  • परियोजना के निर्माण और संचालन के लिए 'राजस्थान-हरियाणा यमुना वाटर एसपीवी' (Special Purpose Vehicle) का गठन किया जाएगा।
  • राजस्थान सरकार डीपीआर केंद्रीय जल आयोग को भेज चुकी है, जबकि हरियाणा ने अलाइनमेंट को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।
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आधुनिक जल प्रबंधन प्रणाली विकसित होगी - फोटो : अमर उजाला
समझौते पर सियासत भी तेज
समझौते के बाद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के जयपुर पहुंचने पर भाजपा ने भव्य स्वागत और रोड शो का आयोजन किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्षों से लंबित यमुना जल परियोजना को उनकी सरकार ने आगे बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि अब शेखावाटी का किसान पानी मिलने के बाद अपनी मेहनत से "सोना उगाएगा"।

समझौते को सार्वजनिक किया जाए- कांग्रेस
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने नए MoA को सार्वजनिक करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि समझौते में किन शर्तों पर सहमति बनी है। गहलोत ने आरोप लगाया कि फरवरी 2024 के पहले हुए समझौते को भी लंबे समय तक सार्वजनिक नहीं किया गया था। उन्होंने कहा कि यदि नए समझौते में भी हरियाणा को प्राथमिकता देने जैसी कोई शर्त शामिल है, तो यह 1994 के मूल समझौते की भावना के विपरीत होगा, जिसमें सभी राज्यों को उपलब्ध जल के अनुपात (Pro Rata Basis) पर पानी देने का प्रावधान है। उन्होंने मांग की कि लोकतांत्रिक पारदर्शिता बनाए रखने के लिए नए MoA की प्रति तत्काल सार्वजनिक की जाए, ताकि राजस्थान के जल अधिकारों को लेकर किसी प्रकार की आशंका न रहे।
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