पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने कहा कि कोरोना से जंग के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण जरूरी है। उन्होंने कहा कि पूरी आबादी का टीकाकरण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ही इस महामारी का मुकाबला किया जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने ने 'वैक्सीन राष्ट्रवाद' पर चिंता जताते हुए कहा कि इसने महामारी से लड़ने की वैश्विक भागीदारी की भावना को चोट पहुंचाई है। उन्होंने कहा कि इस महामारी ने बच्चों को शिक्षा से वंचित कर दिया है, रोजगार चला गया है और लोगों के बीच असमानता की खाई को और भी गहरा कर दिया है। इस महामारी के दो चिंताजनक पहलू हैं, पहला तो स्वयं यह महामारी और दूसरा लोकतंत्र पर इसका प्रभाव।
उन्होंने कहा कि इस वैश्विक महामारी ने दुनिया के हर देश की शासन प्रणाली पर चाहे वह लोकतंत्र हो, राजतंत्र हो या फिर तानाशाही हो, सभी को प्रभावित किया है। चिदंबरम ने कहा कि लोकतंत्र में आलोचना का होना स्वाभाविक है और इसीलिए यह दूसरे प्रकार की शासन प्रणालियों से अलग होता है। उन्होंने कहा कि कई देशों में 'वैक्सीन राष्ट्रवाद' का अनोखा चलन देखने को मिला है, यानी जो वैक्सीन मैंने बनाई या मैं खरीद सकता हूं, वह मेरी है या अपनी वैक्सीन प्रमोट करने के लिए मैं दूसरे की वैक्सीन को अनुमति नहीं दूंगा। पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम के अनुसार इस चलन ने महामारी से लड़ने के वैश्विक सहयोग की भावना को नुकसान पहुंचाया है।
चिदंबरम ने कहा कि सक्षम देशों द्वारा उनकी आबादी के मुकाबले दो या तीन गुना टीके की खरीद की वजह से कई छोटे और गरीब देश टीके की उपलब्धता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें जरूरत है मगर उन्हें टीका नहीं मिल पा रहे। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस महामारी के समय में हमारे देश में भी केंद्रीकरण, टीकाकरण कार्यक्रम की सही योजना और क्रियान्वयन, शिक्षा और हेल्थकेयर संसाधन, सामाजिक और आर्थिक असमानता, विधि के शासन और वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सबसे बड़ी चुनौतियों के रूप में सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि इस महामारी से लड़ने में हमारी कमजोरियां जाहिर हुई हैं, जिनका हमारे पास कोई जवाब नहीं है।
उन्होंने कहा कि इस महामारी ने हर शासन पद्धति की कमियों को सामने ला दिया है। उन्होंने कहा कि कोई भी लोकतंत्र तभी सही मायनों में लोकतंत्र है, जब उसका प्रधानमंत्री हर दिन और अपने हर कार्य में संसद के प्रति जवाबदेह हो और उस लोकतंत्र में एक जागरूक संसद और लोगों के प्रश्न पूछने वाली मीडिया भी मौजूद हो। उन्होंने कहा कि यह जानने और समझने की जरूरत है कि हमारे देश में 'रूल ऑफ लॉ' है ना की 'रूल बाय लॉ'। चिदंबरम ने कहा कि लोकतंत्र में जवाबदेही से बचने वालों को भी आखिरकार तो जवाब देना ही होता है। उन्होंने कहा कि इस कोरोना के समय में केंद्रीकरण का खात्मा हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
उन्होंने कहा कि समय पर टीके की आपूर्ति के लिए ऑर्डर नहीं करना, मूल्य की पेशगी नहीं देना और दो के अलावा अन्य टीकों को आपात इस्तेमाल की मंजूरी नहीं देने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। उन्होंने कहा कि यह अपार खेद का विषय है कि पिछले दशक में 27 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा से ऊपर उठाया गया था, और केवल पिछले दो ही सालों में हमने फिर से 23 करोड़ लोगों को गरीबी रेखा के नीचे धकेल दिया है। उन्होंने कहा कि हमें इसका भी जवाब ढूंढना होगा कि इस महामारी के दौरान देश में असंख्य गरीब बच्चे पढ़ाई में अपने साथ वालों से सिर्फ इसलिए पीछे छूट गए हैं, कि उनके पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए जरूरी संसाधन नहीं हैं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समस्या का समाधान करना भी इस कोरोना काल में एक चुनौती के रूप में सामने आया है। उन्होंने कहा कि हो सकता है आने वाले समय में इस महामारी की दवा खोज ली जाए या पोलियो और चेचक की तरह इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाए, लेकिन यह प्रश्न हमेशा हमारे सामने रहेगा कि क्या हमारे देश का लोकतंत्र इस महामारी की चुनौतियों का सामना कर पाया और क्या लोगों की जान, उनकी आजीविका और जनता, खासकर बच्चे और निर्धन के कल्याण को संरक्षण दे सका। इस महामारी ने पूरे विश्व को प्रभावित किया है और लोकतांत्रिक देशों के लिए महामारी का यह दौर सबसे कठिन है।