राजस्थान के थार मरुस्थल की लोकधुनों को देश-दुनिया तक पहुंचाने वाले प्रसिद्ध अल्गोजा वादक तगा राम भील को इस वर्ष पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 26 मई को उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान करेंगी। केंद्र सरकार ने उन्हें भारत के 'अनसुने नायकों' में शामिल करते हुए सम्मानित करने का निर्णय लिया है।
21 साल की उम्र में बदली जिंदगी
तगा राम भील की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ 15 अगस्त 1981 को आया, जब उन्होंने जैसलमेर के गोपा चौक में अल्गोजा की मनमोहक प्रस्तुति दी। उस समय उनकी उम्र महज 21 वर्ष थी। उनकी धुनों ने वहां मौजूद लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
राष्ट्रपतियों से लेकर प्रधानमंत्रियों को दिखा चुके कला का प्रदर्शन
इस प्रस्तुति ने न केवल उन्हें पहचान दिलाई, बल्कि राज्य प्रशासन और लोक संगीत से जुड़े विशेषज्ञों का ध्यान भी उनकी ओर खींचा। बाद में उन्होंने देश के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और विदेशी मेहमानों के सामने भी अपनी कला का प्रदर्शन किया।
पिता से सीखा संगीत
17 अप्रैल 1960 को जन्मे तगा राम भील ने अल्गोजा बजाने की शुरुआत अपने पिता से सीखी। बचपन में जब वे थार के रेगिस्तान में पशु चराने जाते थे, उसी दौरान संगीत का अभ्यास करते थे। उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए जैसलमेर के उस्ताद अरबा म्यूजिक इंस्टीट्यूट के उस्ताद अकबर खान ने उन्हें अपने संरक्षण में लिया। इसके बाद तगा राम ने सांस और गले के अद्भुत संतुलन से अल्गोजा की ऐसी शैली विकसित की, जिसने लोक संगीत प्रेमियों को गहराई से प्रभावित किया।
थार की धुनों को पहुंचाया अंतरराष्ट्रीय मंच तक
तगा राम भील ने पांच दशक से अधिक समय तक राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा को जीवित रखने का काम किया। उन्होंने फ्रांस, स्पेन, इटली, जर्मनी, जापान, सिंगापुर और अमेरिका सहित कई देशों में प्रस्तुति देकर भारतीय लोकधुनों को वैश्विक पहचान दिलाई। उन्होंने मुसाफिर ग्रुप और उस्ताद अरबा म्यूजिक ग्रुप के साथ दुनिया भर के लोक संगीत समारोहों में हिस्सा लिया। उनकी प्रस्तुतियों में थार के रेगिस्तान की सादगी, गहराई और आध्यात्मिकता साफ झलकती है।
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नई पीढ़ी को सिखा रहे लोकसंगीत
अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के बावजूद तगा राम भील अपनी जड़ों से जुड़े रहे। जैसलमेर के मूलसागर गांव में उन्होंने 'अल्गोजा फोक म्यूजिक इंस्टीट्यूट' की स्थापना की, जहां युवा कलाकारों को लोकसंगीत का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वे मानते हैं कि आधुनिकता, पलायन और डिजिटल दौर के बीच लोकसंगीत की परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर हो रही हैं। ऐसे में नई पीढ़ी तक इस कला को पहुंचाना बेहद जरूरी है।
राजस्थान की लोक विरासत को मिला सम्मान
तगा राम भील को पद्मश्री सम्मान मिलने से राजस्थान की लोकसंगीत परंपरा को नई पहचान मिली है। कला जगत और लोक कलाकारों ने इसे प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के लिए गर्व का क्षण बताया है।