राजस्थान के सबसे बड़े बाघ अभ्यारण्य सरिस्का के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट(CTH) में बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। पिछले दिनों राज्य सरकार की तरफ से सरिस्का बाघ अभ्यारण के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट(CTH) में बदलाव की अधिसूचना जारी की गई थी। इसमें बफर जोन को 42 किमी कम किया गया था। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भुवेंद्र यादव राजस्थान के अलवर से ही सांसद हैं। इस फैसले का जबरदस्त सियासी विरोध हुआ। कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने आरोप लागए कि खान कारोबारियों को पनपाने के लिए राज्य सरकार व वन पर्यावरण मंत्रालय सरिस्का बाघ अभ्यारण के बफर जोन को बदल रहे हैं। सरकार के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई। अब सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए। सरिस्का टाइगर रिजर्व के क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट (सीटीएच) का नया ड्राफ्ट सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर लौटा दिया है कि इसमें नियमों की पालना नहीं की गई है। साथ ही यह भी कहा कि सरिस्का में खानों को बंद करने का आदेश नहीं बदला जाएगा।
अलवर से विधायक व नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है- सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने यह सिद्ध कर दिया कि बेजुबानों की भी दहाड़ गूंजती है, बशर्ते उसे सच्चे मन से आवाज़ दी जाए। सरिस्का के बाघों, जंगलों और प्रकृति की आत्मा को आज न्याय मिला है इसके लिए मैं माननीय सर्वोच्च न्यायालय का हृदय से आभार प्रकट करता हूँ, जिसने न केवल हमारी बात को सुना, बल्कि सरकार के खनन-परस्त फैसले पर करारा तमाचा भी मारा।
जूली ने कहा कि सरकार द्वारा बिना वैज्ञानिक आधार, पारदर्शिता और पर्यावरणीय मूल्यांकन के जो नया CTH ड्राफ्ट तैयार किया गया था, उसे सुप्रीम कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि जब तक सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति न हो, सरिस्का टाइगर रिज़र्व में कोई भी खनन गतिविधि नहीं हो सकती। टहला क्षेत्र, जहाँ बाघिन ST-27 ने मई 2024 में दो शावकों को जन्म दिया, उसे CTH से हटाकर बफर ज़ोन बनाना न केवल नैतिक अपराध था, बल्कि वन्यजीव हत्या का परोक्ष षड्यंत्र भी। उन्होंने कहा- सरकार के फैसले में न विज्ञान था, न जनसुनवाई, न पारदर्शिता, इसमें था सिर्फ पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने की लालसा l और यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि केंद्र और राज्य दोनों जगह अलवर से ही चुने गए वन मंत्री होने के बावजूद, सरिस्का जैसी धरोहर को बचाने के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। भाजपा सरकार ने बाघों की कीमत पर माफियाओं को लाभ पहुंचाने की साजिश रची। ‘‘इकोलॉजिकल सेंसेटिव ज़ोन’’ की जगह उनकी प्राथमिकता ‘‘इकोनोमिक सेंसेटिव ज़ोन’’ बन गई।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सरिस्का का जंगल खनन माफिया या होटल लॉबी की संपत्ति नहीं है, यह बाघों की नर्सरी है, अलवर की शान है, राजस्थान की धरोहर है। जिसे कांग्रेस सरकारों ने CTH का विस्तार कर पुनर्जीवित किया और आज वहाँ 48 बाघों की दहाड़ गूंज रही है यह कांग्रेस की प्रतिबद्धता, वैज्ञानिक सोच और संवेदनशील दृष्टिकोण का परिणाम है। उन्होंने कहा- सरिस्का को खनन की खान नहीं बनने देंगे, यह हमारी सांस्कृतिक, जैविक और भावनात्मक पूंजी है। इसकी रक्षा के लिए हम हर मंच पर, हर अदालत में, हर गाँव में, हर वन में हम डटकर, मिलकर खड़े रहेंगे।