दरअसल, पिछले कुछ समय से RPSC लगातार विवादों में रहा है। आयोग के दो सदस्य गड़बड़ी और अनियमितताओं के मामलों में जेल तक जा चुके हैं। इन घटनाओं ने आयोग की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता से लेकर नियुक्ति प्रक्रिया तक पर लगातार सवाल उठे हैं। ऐसे समय में मंजू शर्मा का स्वेच्छा से पद छोड़ना एक नैतिक और सकारात्मक संदेश माना जा रहा है।
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राजनीतिक और सामाजिक हलकों में इस इस्तीफे की व्यापक चर्चा हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि मंजू शर्मा ने यह दिखाया है कि संवैधानिक संस्थाओं में काम करने वाले लोगों के लिए न केवल ईमानदार होना जरूरी है, बल्कि यह भी जरूरी है कि उनकी ईमानदारी पर कोई संदेह न हो। उनका कदम आयोग की छवि सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।