गुढ़ा ने सरकार और मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। गुढ़ा ने कहा कि आजादी के 80 साल बाद भी समाज के कई वंचित वर्ग ऐसे हैं, जिन्हें आरक्षण और सरकारी योजनाओं का वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने खास तौर पर वाल्मीकि समाज, घुमंतू-अर्धघुमंतू समुदायों और अनुसूचित जाति-जनजाति के कमजोर तबकों की स्थिति पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत बताई।
गुढ़ा ने महात्मा गांधी के उस विचार का जिक्र किया, जिसमें समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के जीवन में बदलाव को सच्चे लोकतंत्र की कसौटी माना गया है। उन्होंने कहा कि आज भी वाल्मीकि समाज के कई परिवार मूलभूत सुविधाओं और सम्मानजनक जीवन से दूर हैं। उन्होंने सवाल किया कि यदि आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आगे बढ़ाना है तो इसका लाभ सीमित परिवारों तक ही क्यों दिखाई देता है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर भी ऐसे समुदाय मौजूद हैं, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े हैं। उन्होंने घुमंतू, अर्धघुमंतू, सपेरा, बंजारा, सारंगी वादक और अन्य पारंपरिक समुदायों का जिक्र करते हुए कहा कि इन वर्गों की वास्तविक स्थिति और जरूरतों का अलग से आकलन किया जाना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि केवल आरक्षण की व्यवस्था होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि उसका लाभ सबसे जरूरतमंद व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं। गुढ़ा ने आरक्षण व्यवस्था में ऐसे सुधारों पर विचार करने की जरूरत बताई, जिससे वंचित परिवारों को वास्तविक अवसर मिल सकें। पूर्व मंत्री ने सरकारी जमीन पर बसे गरीब और घुमंतू परिवारों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए। उनका दावा है कि राजस्थान में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं, जिनके पास अपने घर का पट्टा तक नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान इन परिवारों से वादे किए जाते हैं, जबकि चुनाव के बाद कई बार उन्हें जमीन खाली करने के नोटिस का सामना करना पड़ता है।
गुढ़ा के मुताबिक इससे गरीब और घुमंतू परिवार लगातार असुरक्षा के माहौल में जीवन बिताने को मजबूर हैं। उन्होंने सरकार से ऐसे परिवारों के स्थायी समाधान और उन्हें आवासीय सुरक्षा देने की दिशा में ठोस कदम उठाने की मांग की। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी आरक्षित वर्ग के व्यक्ति को आरक्षण का लाभ लेकर उच्च पद या बेहतर सामाजिक स्थिति हासिल हो जाती है तो उसी समुदाय के बेहद गरीब और पिछड़े व्यक्ति तक अवसर क्यों नहीं पहुंचता। उन्होंने कहा कि आरक्षण व्यवस्था की प्रभावशीलता का आकलन इस आधार पर भी होना चाहिए कि समाज के सबसे कमजोर तबके को वास्तव में कितना लाभ मिला। उन्होंने सामाजिक न्याय को केवल चुनावी मुद्दा बनाने के बजाय इसे लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारी मानने की जरूरत बताई।
विभिन्न आंदोलनों और वंचित वर्गों के मुद्दों पर गुढ़ा ने कहा कि सरकार को सिर्फ बैठकों और घोषणाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनका कहना है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े समुदायों की समस्याओं के समाधान के लिए जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इन वर्गों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया तो आने वाले समय में सामाजिक न्याय और आरक्षण के मुद्दे बड़ा राजनीतिक प्रभाव डाल सकते हैं। गुढ़ा ने सवाल किया कि जब देश आजादी के 100 वर्ष पूरे करने की दिशा में बढ़ेगा, तब वाल्मीकि समाज, घुमंतू समुदाय और अन्य वंचित वर्गों की स्थिति वास्तव में कितनी बदलेगी। उन्होंने कहा कि इसका जवाब सरकार और व्यवस्था को अब से तैयार करना होगा।