राज्यसभा नामांकन की तस्वीरों से मची हलचल
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भाजपा के राज्यसभा उम्मीदवारों के नामांकन के दौरान राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर अंदरूनी समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। नामांकन प्रक्रिया में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़, उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी, उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी विधानसभा परिसर पहुंचीं, लेकिन उनकी मौजूदगी को लेकर राजनीतिक हलकों में अलग-अलग तरह की व्याख्याएं की जा रही हैं।
सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर रही कि भाजपा उम्मीदवार डॉ. सतीश पूनिया के नामांकन के दौरान वसुंधरा राजे उनके साथ नजर नहीं आईं। वहीं पार्टी की दूसरी उम्मीदवार अलका गुर्जर के नामांकन के समय उनकी मौजूदगी तस्वीरों में स्पष्ट दिखाई दी। इसके बाद भाजपा के भीतर पुराने राजनीतिक समीकरणों और कथित गुटबाजी को लेकर चर्चाओं का दौर फिर शुरू हो गया।
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राजस्थान भाजपा की राजनीति में वसुंधरा राजे और डॉ. सतीश पूनिया के संबंध लंबे समय से राजनीतिक विश्लेषण का विषय रहे हैं। सतीश पूनिया के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उन्हें भाजपा के संभावित मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में भी प्रस्तुत किया जाता रहा। उस दौर में उनके समर्थन में कई राजनीतिक कार्यक्रमों में विशेष नारे भी सुनाई देते थे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि उस समय संगठन और नेतृत्व के भीतर अलग-अलग शक्ति केंद्रों की चर्चा भी होती रही।
हालांकि डॉ. सतीश पूनिया ने सार्वजनिक रूप से कभी वसुंधरा राजे के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक दूरी की चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। भाजपा के भीतर यह धारणा भी व्यक्त की जाती रही कि प्रदेश संगठन और पूर्व मुख्यमंत्री के राजनीतिक प्रभाव को लेकर अलग-अलग मत मौजूद थे।
अब जबकि भजनलाल शर्मा सरकार को लगभग ढाई वर्ष का समय होने जा रहा है, राज्यसभा नामांकन के दौरान सामने आए ये दृश्य एक बार फिर भाजपा के अंदरूनी समीकरणों को लेकर चर्चा का कारण बन गए हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व लगातार संगठनात्मक एकजुटता पर जोर देता रहा है, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रम और सार्वजनिक मंचों पर नेताओं की मौजूदगी या अनुपस्थिति अक्सर नए राजनीतिक संदेशों के रूप में देखी जाती है।