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Khejari Tree: लॉरेंस का खौफ, भाटी की धमकी से उबाल; पेड़ के लिए मरने को क्यों तैयार पश्चिम के राजस्थानी? जानें

Fri, 24 Jan 2025 06:00 AM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

Khejari Tree: कहा जाता है कि खेजड़ी को 1983 में राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया था। लोग खेजड़ी और उसके इतिहास की कहानियां अपने बच्चों को सुनाते हैं। अब इस पेड़ को लेकर आंदोलन और सियासत हो रही है, जिसमें लॉरेंस विश्नोई से लेकर रवींद्र सिंह भाटी का नाम शामिल है…आइये पूरा मामला समझते हैं खबर में।
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खेजड़ी का पेड़ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पश्चिमी राजस्थान में खेजड़ी के पेड़ों को लेकर एक तरफ जमीन पर आंदोलन हो रहे हैं तो दूसरी तरफ कई किलोमीटर दूर राजधानी जयपुर में सियासत भी गर्म हैं। पाकिस्तान से सटी भारत-पाक सीमा के जिलों में खेजड़ी एक धर्म है। ऐसा क्यों है? और इसके पीछे क्यों आंदोलन हो रहे हैं। आंदोलन पर सियासत का सच क्या है…सब इस रिपोर्ट में जानेंगे।

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सबसे पहले बात कर लेते हैं। जमीन पर चल रहे आंदोलनों की। सीमा से सटे बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर में लोग चाहते हैं कि खेजड़ी के पेड़ ना काटें जाएं। चाहे कारण सोलर प्लांट हो या फिर विंड एनर्जी के बड़े-बड़े टॉवर। 



सरकार का दांव
दरअसल, पश्चिचमी राजस्थान की जमीन मरू भूमि में आती है। यानि यहां साल में एक ही फसल बाजरे की होती है। बाकी समय खेतों में कुछ नहीं होता। साथ ही सरकारी जमीन बड़े पैमान पर है। इस जमीन का उपयोग करने के लिए सरकार ने एनर्जी को माध्यम बनाया है। करोड़ों का निवेश इस जमीन के भरोसे सोलर और विंड सेक्टर में किया गया है। पर सरकार भूल गई कि इस मरू भूमि पर राजस्थान का राज्य वृक्ष खेजड़ी लगा हुआ है। इसको लेकर लोगों की आस्था चरम पर है। लोग खेजड़ी और उसके इतिहास की कहानियां अपने बच्चों को सुनाते हैं। सरकार की इस भूल का परिणाम ये हुआ कि भारतीय राष्ट्रीय सौर ऊर्जा महासंघ (NSEFI) ने केन्द्र और राज्य सरकार को चिट्ठी लिख दी। इसमें बताया गया कि अड़चनों के कारण अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं में 8500 करोड़ का निवेश अटक गया है।
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इस शिकायत के एवज में ही बाड़मेर एसपी नरेंद्र कुमार मीणा के निर्देश पर शिव थाने में मामला दर्ज किया गया। मामले की जांच सीआईडी सीबी करेगी। मीडिया में आईं खबरों के मुताबिक NSEFI के CEO सुब्रह्मण्यम पुलिपका ने पत्र लिखकर विधायक रविंद्र सिंह भाटी की शिकायत की थी। इसमें लिखा था कि बाड़मेर के शिव विधानसभा क्षेत्र में पवन और सौर ऊर्जा परियोजनाओं के डेवलपर्स को स्थानीय विधायक के कारण समस्याएं हो रही हैं। कर्मचारियों को धमकियां दी जा रही है। जबरन वसूली की भी कोशिश की जा रही है। इस चिट्ठी पर पुलिस एक्टिव हुई और एसपी के निर्देश पर मामला दर्ज किया गया। 

रविंद्र सिंह भाटी के खिलाफ मामला हुआ था दर्ज
हालांकि इस मसले पर विधायक भाटी का अपना पक्ष है। वो कहते हैं कि किसी भी तरह के प्रोजेक्ट में कोई अड़चन नहीं डाली। किसानों के हक की लड़ाई लड़ रहा हूं। उनको मुआवजा सही नहीं दिया जा रहा है। बालेसर में एक किसान ने अपने खेत में सोलर प्लांट लगाने के लिए जेसीबी से खेजड़ी के 20 पेड़ कटवा दिए। इसके बाद पूरे इलाके के पर्यावरण प्रेमी किसान के खेत में पहुंच गए थे, इसके बाद यहां स्थिति खराब हो गई थी। वैसे 17 नवंबर 2024 को भी निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी के खिलाफ राजकार्य में बाधा का केस दर्ज किया गया था। इसकी जांच सीआईडी-सीबी कर रही है।

दरअसल, प्रदर्शन केवल बाड़मेर में नहीं हो रहे हैं। बल्कि जोधपुर और बीकानेर में भी विश्नोई समाज सड़कों पर उतरा हुआ है। बीकानेर में तो प्रदर्शन के दौरान लारेंस विश्नोई के पोस्टर भी दिखाए गए। हालांकि बाद में  समाज के लोगों पोस्टर लहराने वालों से किनारा कर लिया। अब बात जोधपुर की तो यहां पर खेजड़ी काटने के विरोध में विश्नोई समाज का जोधपुर बंद कई दिनों से चल रहा है।

लॉरेंस का पोस्टर लेकर खड़े लोग
अखिल भारतीय विश्नोई महासभा आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर रही है। शहर सहित ग्रामीण इलाकों में भौंपू के जरिए प्रचार किया जा रहा है। तो घरों में पीले चावल डालकर लोगों को आंदोलन करने के लिए आह्वान किया जा रहा है। अखिल भारतीय विश्नोई महासभा के अध्यक्ष देवेंद्र बुड़िया कहते हैं कि आंदोलन में  युवाओं का भी सहयोग भरपूर मिल रहा है। जोधपुर के व्यापारी भी पक्ष में हैँ। रैली में समाज के लोगों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया है। 
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इतिहास
खेजड़ी को पेड़ों का अपना इतिहास है। इस पेड़ को बचाने के लिए 363 लोगों ने अपनी जान दी थी। जोधपुर में पर्यावरण और खेजड़ी के पेड़ बचाने के लिए 294 साल पहले 363 लोगों ने जान दी थी। उनकी याद में जोधपुर जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूर खेजड़ली गांव में हर साल सितंबर को मेला लगता है। इस मेले में आंदोलन की प्रणेता अमृता देवी सहित मारे गए 363 लोगों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने पूरे देश से लोग पहुंचते हैं। मेले में महिलाएं सोने के जेवरातों से सज-धजकर पहुंचती हैं।

क्या हुआ था उस दिन
सितंबर 1730...मंगलवार का दिन था। मारवाड़-जोधपुर के महाराजा अभय सिंह नया महल बनवा रहे थे। महल निर्माण के लिए लकड़ियों की जरूरत थी। महल से 24 किलोमीटर दूर गांव खेजड़ली से पेड़ काटकर लाने का आदेश दिया गया था। सैनिक खेजड़ली गांव पहुंचे और रामू खोड़ के घर के बाहर लगा खेजड़ी का पेड़ काटने लगे। इसका रामू की पत्नी अमृता देवी ने विरोध किया था। वह विरोध करते हुए पेड़ से चिपक गई थीं। तब सैनिकों ने उन्हें कुल्हाड़ी से काट दिया था। इसके बाद 362 लोग खेजड़ी के पेड़ से चिपक गए। उन सभी को खेजड़ी के साथ ही काट दिया गया था।

जब महाराजा अभय सिंह तक यह बात पहुंची तो उन्होंने पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी। महाराजा ने बिश्नोई समाज को लिखित में वचन दिया कि 'मारवाड़ में कभी खेजड़ी का पेड़ नहीं काटा जाएगा'। इस दिन की याद में खेजड़ली में हर साल शहीदी मेला लगता है। वन्य जीवों को बचाने में भी बिश्नोई समाज हमेशा आगे रहा है। हिरणों को बचाने के प्रयास में समाज के कई लोग शिकारियों की गोली का शिकार हो चुके हैं।
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