सांभर की प्रसिद्ध मिठाई फीणी अपने अनोखे स्वाद और बनावट के लिए दुनिया भर में मशहूर है। मकर संक्रांति और अन्य त्योहारों पर इसकी मांग सबसे अधिक होती है। पारंपरिक तौर पर मैदा और घी से बनने वाली यह मिठाई 1296 महीन तारों से तैयार की जाती है। इसकी महीन बनावट और स्वाद के पीछे सदियों पुरानी परंपरा और तीन दिन की मेहनत छिपी होती है।
16वीं शताब्दी से जुड़ा है इतिहास
सांभर की फीणी का इतिहास 16वीं शताब्दी तक जाता है। चंदबरदाई द्वारा लिखित पृथ्वीराज रासो में इस मिठाई का जिक्र मिलता है। कहा जाता है कि जब पृथ्वीराज चौहान की शादी हुई थी, तब शाही भोज में इसे मेहमानों को परोसा गया था। यह मिठाई न केवल सांभर की पहचान है बल्कि इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी है।
सर्दियों और मकर संक्रांति पर बढ़ती मांग
सांभर की फीणी की खुशबू सर्दियों के मौसम और खासकर मकर संक्रांति जैसे त्योहारों को और खास बना देती है। सर्दियों में यह मिठाई अधिक स्वादिष्ट बनती है, क्योंकि इसकी महीन बनावट सांभर की नमकयुक्त जलवायु में ही सबसे अच्छी तैयार होती है। जयपुर, कोलकाता, मुंबई, पुणे जैसे बड़े शहरों के साथ-साथ विदेशों में भी इस मिठाई की बहुत मांग है।
फीणी बनाने की अनोखी प्रक्रिया
जितनी स्वादिष्ट ये मिठाई है उतनी ही मेहनत इसे बनाने में भी लगती है। तीन दिन की मेहनत का नतीजा है फीणी, जिसमें पहले दिन मैदा और घी को खुले आसमान के नीचे रखा जाता है ताकि यह सही बनावट में आ सके। दूसरे दिन इसे खींचकर महीन तार बनाए जाते हैं और माला की तरह आकार दिया जाता है। तीसरे दिन इसे गरम घी में तलकर तैयार किया जाता है। यह महीन तार ही फीणी को अनोखा और स्वादिष्ट बनाते हैं।
सांभर के बाजारों में प्रवेश करते ही फीणी की सौंधी खुशबू हर किसी का ध्यान खींच लेती है। पारंपरिक तरीके से देसी घी में तैयार की गई यह मिठाई न केवल स्थानीय लोगों बल्कि देश-विदेश के पर्यटकों की भी पहली पसंद है। सांभर में मिष्ठान भंडार के मालिक दीपक शर्मा बताते हैं कि उनकी तीसरी पीढ़ी यह मिठाई बना रही है। मकर संक्रांति और नए साल जैसे त्योहारों पर फीणी का सेवन शुभ माना जाता है। सांभर की यह मिठाई न केवल पारंपरिक त्योहारों की मिठास को बढ़ाती है, बल्कि अपने अनोखे स्वाद से हर किसी के दिल में जगह बना लेती है।
फीणी केवल एक मिठाई नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और मेहनत का अद्भुत संगम है। यह मिठाई हर त्योहार को खास बनाने के साथ-साथ यहां की सांस्कृतिक पहचान को भी जीवंत रखती है।