फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Rajasthan JLF: 'माई मदर माई लाइफ' सेशन में बेटी अक्षता ने सुधा मूर्ति से पूछे सवाल,ऋषि सुनक भी रहे मौजूद

Sat, 01 Feb 2025 05:25 PM IST
अर्पित याज्ञनिक न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शनिवार को 'माई मदर माई लाइफ' सेशन में पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की पत्नी अक्षता मूर्ति ने अपनी मां सुधा मूर्ति से सवाल जवाब किए। इस दौरान सुधा मूर्ति के दामाद ऋषि सुनक मौजूद रहे।
विज्ञापन
सुधा मूर्ति और अक्षता मूर्ति की बातचीत। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आयोजित "माई मदर माई लाइफ" सेशन में पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की पत्नी अक्षता मूर्ति ने अपनी मां, प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका सुधा मूर्ति से प्रेरणादायक बातचीत की। इस दौरान सुधा मूर्ति ने अपने जीवन के अनमोल अनुभव साझा किए और बताया कि सेवा और परोपकार की सीख उन्हें बचपन से ही मिली थी। मां-बेटी की बातें मंच पर चलती रहीं। वहीं सामने बैठे पूर्व ब्रिटिश पीएम ऋषि सुनक दोनों को सुनते रहे।

विज्ञापन


अक्षता मूर्ति ने अपनी मां सुधा मूर्ति से अपने बचपन और परवरिश को लेकर बातचीत की शुरुआत की। सुधा मूर्ति और अक्षता मूर्ति के बीच एक खास बातचीत में जीवन के मूल्यों, सेवा, आदर्शवाद और पारिवारिक संबंधों पर चर्चा हुई। इंटरव्यू में सुधा मूर्ति ने अपनी जीवन यात्रा के कई प्रेरणादायक किस्से साझा किए। अक्षता मूर्ति ने भी अपने जीवन और मां से मिली सीख के अनुभव बांटे। यह बातचीत सेवा, आदर्शों और परिवार के महत्व को नये नजरिये से समझने का अवसर था।

सेवा की सीख बचपन से मिली
अक्षता मूर्ति का सवाल:
आपने मुझे जन्मदिन पर पार्टी करने नहीं दी और उन पैसों को चैरिटी करने की सलाह दी। तब मुझे बुरा लगा था, लेकिन वह मेरी नींव बनी। आपने तब CSR का महत्व सिखाया, जब यह फैशनेबल या अनिवार्य नहीं था। इसकी नींव कहां से पड़ी?
विज्ञापन


सुधा मूर्ति: मेरी दादी ने कभी स्कूल नहीं देखा था, लेकिन वे गांव में डिलीवरी एक्सपर्ट थीं। वे सेवा करती थीं, बिना किसी उम्मीद के। मेरे पिता नास्तिक थे, लेकिन उनके लिए सेवा ही ईश्वर थी। इसलिए मुझे कभी नहीं लगा कि मैंने कुछ खास किया है। मैं बस ड्यूटी पर फोकस करती हूं, रिजल्ट की चिंता नहीं करती। मेरी किताब Three Thousand Stitches में इसका जिक्र है। 20 साल पहले जब मैं सेक्स वर्कर्स के पास गई, तब उन्होंने मुझ पर टमाटर फेंके और जलील किया। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैंने 3000 सेक्स वर्कर्स की जिंदगी बदली। इस काम में मेरे पति नारायण मूर्ति का काफी सहयोग रहा।

आदर्शवाद की उम्र नहीं होती
अक्षता मूर्ति:
अगर आप 20 की उम्र में आदर्शवादी नहीं हैं तो आपके पास दिल नहीं है। अगर आप 40 के बाद भी आदर्शवादी हैं तो इसका मतलब है कि यू डोंट हैव अ ब्रेन। क्या आदर्शवादी होना सिर्फ बचपन तक सीमित है?

सुधा मूर्ति: मैं 74 की उम्र में भी आदर्शवादी हूं। मैंने बच्चों को सिखाया कि पहले एक अच्छा इंसान बनना है। दिल साफ रखना है। जैसा सोचो, वैसा ही बोलो और वैसा ही करो। तभी अच्छी जिंदगी जी पाओगे।

पुस्तकों से मिली प्रेरणा
अक्षता मूर्ति:
शेक्सपियर की हैमलेट और एलिसन-वे की सिक्स ट्यूटर क्वीन मुझे बहुत पसंद हैं क्योंकि इनमें रेजिलिएंस की कहानी है। क्या आपको भी किसी किताब ने प्रेरित किया?

सुधा मूर्ति: कई किताबों ने मुझे सिखाया। 10 Thousand Miles Without a Cloud और Kingdom of Indus ने जीवन की बड़ी सीखें दीं।

फिलैंथ्रॉपी की शुरुआत
सुधा मूर्ति:
1996 में अक्षता ने मुझे सिखाया कि फिलैंथ्रॉपी क्यों जरूरी है। उसका एक दोस्त आनंद आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। उसने मुझसे कहा, "अगर तुम सोशल वर्क नहीं कर सकती तो किसी से कुछ कहने का हक भी नहीं है।" उसी दिन मैंने ठान लिया कि मैं फिलैंथ्रॉपी करूंगी।

वर्किंग विमेन के सवाल पर सुझाव
ऑडियंस सवाल:
मैं एक वर्किंग वुमन हूं। कभी-कभी गिल्ट महसूस करती हूं कि बच्चे को समय नहीं दे पाती।

सुधा मूर्ति: बच्चों को आपकी सबसे ज्यादा जरूरत 14 साल तक होती है। उसके बाद वे फोन में व्यस्त हो जाते हैं। आप ब्रेक लेकर करियर में लौट सकती हैं।
विज्ञापन


इस इंटरव्यू ने मां-बेटी के बीच गहरे संबंधों और जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों पर रोशनी डाली। सुधा मूर्ति का सेवा और आदर्शवाद का संदेश आज भी प्रेरणा देने वाला है। वहीं अक्षता मूर्ति की दृढ़ता और सादगी ने दिखाया कि सफलता और सेवा साथ-साथ चल सकती है।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें