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राजस्थान के निकायों की कमाई कम, खर्च ज्यादा; नए पार्षदों के सामने विकास से पहले पैसे का संकट

Tue, 08 Sep 2026 06:03 AM IST
Sourabh Bhatt न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

राजस्थान के शहरी निकायों की अपनी आय खर्च के मुकाबले काफी कम है। नई नगर सरकारों के सामने विकास कार्यों के साथ राजस्व बढ़ाने और सरकारी अनुदान पर निर्भरता घटाने की चुनौती होगी।

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जयपुर नगर निगम - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जयपुर: राजस्थान में 9 और 11 सितंबर को 309 नगरीय निकायों में चुनाव होंगे। 14 सितंबर को नतीजे आएंगे और इसके साथ ही शहरों को नई नगर सरकारें मिल जाएंगी। चुनाव में पार्षद बनने के लिए प्रत्याशी सड़क, नाली, सफाई, स्ट्रीट लाइट और विकास के बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद असली सवाल सामने आएगा—इन वादों को पूरा करने के लिए पैसा आएगा कहां से?

यही नई नगर सरकारों की सबसे बड़ी राजनीतिक और आर्थिक चुनौती है। आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान के शहरी निकाय अपनी कमाई से अपना खर्च तक पूरा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में पार्षदों के सामने जनता की उम्मीदें पूरी करने के साथ सरकार से फंड लाने की राजनीतिक चुनौती भी होगी।

 

राजस्थान में 9 और 11 सितंबर को 309 नगरीय निकायों में चुनाव होंगे। 14 सितंबर को नतीजे आएंगे और इसके साथ ही शहरों को नई नगर सरकारें मिल जाएंगी। चुनाव में पार्षद बनने के लिए प्रत्याशी सड़क, नाली, सफाई, स्ट्रीट लाइट और विकास के बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद असली सवाल सामने आएगा। इन वादों को पूरा करने के लिए पैसा आएगा कहां से?

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यही नई नगर सरकारों की सबसे बड़ी राजनीतिक और आर्थिक चुनौती है। आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान के शहरी निकाय अपनी कमाई से अपना खर्च तक पूरा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में पार्षदों के सामने जनता की उम्मीदें पूरी करने के साथ सरकार से फंड लाने की राजनीतिक चुनौती भी होगी।

2023-24 में कमाई 1,460 करोड़, खर्च 8,022 करोड़


राजस्थान सरकार के छठे राज्य वित्त आयोग के आंकड़ों और 2026-27 के बजट के मुताबिक, 2023-24 में सभी शहरी निकायों की अपनी आय 1,460.35 करोड़ रुपए थी। इस दौरान उन्हें कुल 7,531.09 करोड़ रुपए की प्राप्तियां हुईं, जबकि कुल खर्च 8,022.07 करोड़ रुपए रहा। यानी निकायों की कुल प्राप्तियां भी उनके खर्च से 490.98 करोड़ रुपये कम थीं। अपनी आय का हिस्सा कुल प्राप्तियों में सिर्फ करीब 19.4 प्रतिशत रहा और यह कुल खर्च का करीब 18.2 प्रतिशत ही था।
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कमाई बढ़ी, लेकिन खर्च उससे कहीं तेज बढ़ा

नगर निकायों की अपनी आय जरूर बढ़ी है। 2019-20 में यह 798.37 करोड़ रुपए थी, जो 2023-24 में बढ़कर 1,460.35 करोड़ रुपए हो गई। यानी करीब 83 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। लेकिन इसी अवधि में खर्च 4,940.46 करोड़ से बढ़कर 8,022.07 करोड़ रुपए पहुंच गया। मतलब निकायों की आय बढ़ने के बावजूद खर्च की रफ्तार उससे काफी आगे रही।

सरकार के अनुदान पर बढ़ती निर्भरता

वित्तीय दबाव का असर सरकारी सहायता पर भी दिखता है। शहरी निकायों को मिलने वाला अनुदान 2023-24 के 2,491 करोड़ रुपए से बढ़कर 2024-25 में 4,298 करोड़ रुपए हो गया। एक साल में इसमें करीब 72.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2024-25 में मिले अनुदान में 1,982 करोड़ रुपए परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए दिए गए, जबकि इससे पिछले साल यह राशि 1,492 करोड़ रुपए थी।
2026-27 के बजट में भी शहरी निकायों के लिए बड़े स्तर पर प्रावधान किए गए हैं। ऑक्ट्रॉय क्षतिपूर्ति और राज्य व केंद्रीय वित्त आयोग के अनुदान के तौर पर सीधे 7,775.15 करोड़ रुपए का प्रावधान है।
इसके अलावा AMRUT 2.0 के लिए 6,765.66 करोड़, स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के लिए 1,289.25 करोड़, राजस्थान अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए 812.66 करोड़ और निकायों की सड़कों के रखरखाव व मरम्मत के लिए 500 करोड़ रुपये रखे गए हैं। बड़े शहर भी अपनी कमाई से खर्च नहीं संभाल पा रहे। यह स्थिति केवल छोटे निकायों तक सीमित नहीं है। बड़े शहरों के उपलब्ध ऑडिटेड खातों में भी अपनी आय और खर्च के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है।

अगले पांच साल में बढ़ सकता है वित्तीय अंतर
राजस्थान के शहरी निकायों की वित्तीय स्थिति पर दबाव आने वाले वर्षों में भी कम होता नजर नहीं आ रहा। 16वें वित्त आयोग की अवधि के लिए किए गए अनुमान के मुताबिक, 2026-27 से 2030-31 के बीच शहरी निकायों का कुल राजस्व-व्यय अंतर 21,592.81 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। इसमें केंद्रीय वित्त आयोग के अनुदान को शामिल नहीं किया गया है। अनुमान के मुताबिक यह अंतर 2026-27 में 2,952.34 करोड़ रुपये से बढ़कर 2030-31 में 5,887.90 करोड़ रुपए हो सकता है।
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वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाने पर जोर
राजस्थान वित्त आयोग के चेयरमैन अरुण चतुर्वेदी ने कहा कि फिलहाल राज्य सरकार अपनी आय से शहरी निकायों को आर्थिक मदद दे रही है। हालांकि निकायों को धीरे-धीरे वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि आयोग दूसरे राज्यों और नगर निकायों के सफल मॉडल का अध्ययन कर रहा है। इनमें तमिलनाडु जैसे राज्यों के मॉडल भी शामिल हैं। इनके आधार पर राजस्थान के लिए उपयुक्त व्यवस्था की सिफारिश सरकार से की जाएगी। चतुर्वेदी के मुताबिक, लंबे समय में शहरी निकायों को अपने राजस्व के नए स्रोत विकसित करने होंगे। उन्होंने नगर निकायों के लिए म्युनिसिपल बॉन्ड को भी एक संभावित विकल्प बताया, हालांकि इसके इस्तेमाल का फैसला राज्य सरकार को करना होगा।

 
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