कोटपूतली में बीते 65 घंटों से बोरवेल में फंसी मासूम चेतना को बाहर निकालने के लिए अब प्रशासन ने रैट माइनर्स को बुलाया है। एनडीआरएफ इंचार्ज योगेश मीणा ने बताया रेस्क्यू के दौरान 155 फीट पर पत्थर आ गया था। इसके बाद पाइलिंग मशीन की बीट चेंज करके 160 फीट तक खुदाई कर ली गई है, लेकिन 170 फीट खुदाई की जरूरत है। इसके बाद बोरवेल तक पहुंचने के लिए हॉरिजेंटल खुदाई मैनुअल की जाएगी। इसके लिए अब रैटमाइनर्स को काम पर लगाया जा रहा है।
कौन होते हैं रैटमाइनर्स
रैटमाइनर्स भारत के उत्तर-पूर्वी इलाकों में रहने वाले वो जनजातिय लोग होत हैं, जो छोटी सुरंगों की मदद से खदान के अंदर से खनिजों को बाहर निकालते हैं। खासतौर से मेघालय, जोवाई और चेरापूंजी में इस समुदाय के लोग रहते हैं। ये पतले होते हैं, ताकि पतली सुरंगों में आराम से घुस सकें। आज इन्हीं की मदद से मासूम चेतना को बोरवेल से बाहर निकालने के काम किया जा रहा है।
कैसे की जाती है रैट होल माइनिंग?
दरअसल, रैट होल माइनिंग के लिए किसी बड़ी मशीन का इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि इसके लिए रैट होल माइनर्स हाथ के औजारों का इस्तेमाल करते हैं। वो धीरे-धीरे एक पतली सुरंग खोदते हैं और उसका मलबा बाहर निकालते जाते हैं। ये बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे चूहे अपना बिल बनाते हैं।
उत्तरकाशी की सिलक्यारा टनल में फंसे मजदूरों को निकाला था बाहर
उत्तरकाशी की सिलक्यारा टनल में फंसे 41 मजदूरों को निकालने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी एजेंसियां युद्ध स्तर पर काम कर रहीं थी। रेस्क्यू के 17वें दिन अमेरिकी ऑगर मशीन के मलबे को टनल के अंदर से पूरी तरह बाहर निकाल लिया गया था। अब इसके 45 फीट से आगे की खुदाई की जिम्मेदारी रैट माइनर्स को मिली थी। भारी भरकम मशीनों के फेल हो जाने के बाद अब सुरंग के अंदर फंसे मजदूरों को बाहर निकालने के लिए रैट माइनर्स जी जान में लग गए थे। इन्हीं के हाथों में सुरंग के 41 मजदूरों की जिंदगी थी।
किसी तरह की हैं चुनौतियां?
रैट-होल माइनिंग से पर्यावरणीय खतरे पैदा होते हैं। इस तरीके में खदानें आमतौर पर अनियमित होती हैं। इनमें उचित वेंटिलेशन, संरचनात्मक सहायता या श्रमिकों के लिए सुरक्षा गियर जैसे सुरक्षा उपायों का अभाव होता है। इसके अतिरिक्त, खनन प्रक्रिया से भूमि क्षरण, वनों की कटाई और जल प्रदूषण हो सकता है।