दोनों नेताओं की सभा को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज
- फोटो : Amar Ujala
राजस्थान के निकाय चुनाव के बीच सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। असदुद्दीन ओवैसी और हनुमान बेनीवाल के एक मंच पर आने की संभावना ने चुनावी समीकरणों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। जयपुर में दोनों नेताओं की सभा को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह साथ आना कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक के लिए बड़ा झटका साबित होगा?
गठबंधन को मानने से एआईएमआईएम का इंकार
एआईएमआईएम के प्रदेश उपाध्यक्ष बाबू भाई ‘फ्रिज वाले’ ने इसे गठबंधन मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि यह किसी राजनीतिक गठबंधन की बजाय ‘इंसानियत की दुकान’ है। हालांकि, चुनावी जमीन पर इसका असर कितना होगा, यह परिणाम सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
भाजपा को मिल सकता है फायदा
राजनीतिक विश्लेषण का एक अहम पहलू जाट और मुस्लिम वोटों का संभावित बिखराव है। कांग्रेस को लंबे समय से इन वर्गों के एक हिस्से का समर्थन मिलता रहा है। ऐसे में यदि बेनीवाल के प्रभाव वाले जाट मतदाता और ओवैसी के समर्थक मुस्लिम मतदाताओं का कुछ हिस्सा कांग्रेस से दूरी बनाता है, तो इसका सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है। हालांकि, एआईएमआईएम ने राजस्थान में सिर्फ 8 प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतारे हैं, लेकिन ओवैसी की मुस्लिम समुदाय में लोकप्रियता और बेनीवाल के जमीनी प्रभाव को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है। बेनीवाल की पार्टी के करीब 1200 उम्मीदवार चुनाव मैदान में होने का दावा भी इस समीकरण को महत्वपूर्ण बनाता है।
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सोशल मीडिया बनेगा मजबूत हथियार
इसके साथ ही बेनीवाल की सोशल मीडिया टीम को भी चुनावी अभियान का मजबूत हथियार माना जा रहा है। सोशल मीडिया के जरिए तेजी से संदेश पहुंचाने की उनकी रणनीति और ओवैसी की जनसभाओं की अपील अगर साथ आती है, तो कांग्रेस के लिए जयपुर में वोटों का गणित बिगड़ने की आशंका बढ़ सकती है। अब निगाहें जयपुर की सभा पर टिकी हैं। ओवैसी-बेनीवाल की साझा मौजूदगी महज एक मंच साझा करना होगी या राजस्थान की निकाय राजनीति में नए वोट समीकरण की शुरुआत- यह चुनावी नतीजे ही तय करेंगे।