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Rajasthan Politics: नाम बदले, क्या बदलेगी तस्वीर; राजस्थान में नाम बदलने की सियासत के पीछे मायने क्या?

सार

Rajasthan Political Scenario: राजस्थान में भजनलाल शर्मा सरकार ने माउंट आबू, जहाजपुर और कामां सहित कई स्थानों व योजनाओं के नाम बदलने की घोषणा की है। विपक्ष इसे प्रतीकात्मक राजनीति बता रहा है, जबकि सरकार इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार पर लिया गया निर्णय बता रही है। प्रदेश में अब इसी को लेकर सियासी बहस शुरू हो गई है।
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राजस्थान में जगहों के नाम बदलने पर सियासी बहस - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राजस्थान की राजस्थान में भजनलाल शर्मा सरकार ने प्रतीकों की राजनीति की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है। चौक-चौराहों के बाद अब शहरों के नाम भी बदले जा रहे हैं। विधानसभा में विनियोग विधेयक पर उत्तर देते हुए मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि माउंट आबू का नाम ‘आबू राज’, जहाजपुर का ‘यज्ञपुर’ और कामां का ‘कामवन’ किया जाएगा। सरकार का कहना है कि ये निर्णय स्थानीय मांग, ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक महत्व को ध्यान में रखकर लिए गए हैं। इससे पहले भजनलाल सरकार में पिछली सरकार की जगहों व कई योजनाओं के नाम भी बदले जा चुके हैं।

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गुलाबी नगरी जयपुर में भी कई सड़कों, चौराहों, पुलों और उद्यानों के नाम बदले गए। नए नामों को भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की विचारधारा से जोड़ा जा रहा है। तीन वर्ष पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को समर्पित ‘भारत जोड़ो उच्च स्तरीय सेतु’ नाम दिया था, जिसे बदलकर सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम पर कर दिया गया। सेंट्रल पार्क (केंद्रीय उद्यान) और टोंक मार्ग का नाम पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत के नाम पर रखने का भी निर्णय लिया गया है।


 
भजनलाल सरकार ने पिछली सरकार की इन योजनाओं के बदले नाम

  • ‘इंदिरा रसोई योजना’ का नाम बदलकर ‘श्री अन्नपूर्णा रसोई योजना’ किया गया।
  • ‘चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना’ अब ‘मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना’ कहलाती है।
  • ‘राजीव गांधी शैक्षणिक उत्कृष्टता छात्रवृत्ति योजना’ का नाम बदलकर ‘मुख्यमंत्री उत्कृष्टता छात्रवृत्ति योजना’ किया गया।
  • ‘राजीव गांधी ग्रामीण एवं शहरी खेल प्रतियोगिता’ का नाम बदलकर ‘मुख्यमंत्री ग्रामीण एवं शहरी खेल प्रतियोगिता’ कर दिया गया।

 

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कांग्रेस इस मुद्दे पर कई बार भारतीय जनता पार्टी पर पलटवार कर चुकी है। उसका आरोप है कि सरकार ने केवल योजनाओं और स्थानों के नाम बदले हैं, लेकिन धरातल पर कोई ठोस कार्य नहीं हुआ।

 
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार त्रिभुवन का कहना है कि जब सरकारें पब्लिक से जुड़े इश्यू एड्रेस नहीं कर पाती हैं तो नाम बदले जाते हैं ताकि लोगों को यह भ्रम रहे कि काम हो रहा है। लेकिन वास्तव में फर्क तब पड़ता है जब परिवर्तन गुणात्मक हो। उदाहरण के लिए दिल्ली की जेएनयू बीजेपी के टारगेट पर रही। लेकिन बात तब होती, जब वे उसकी स्तर की कोई दूसरी यूनिवर्सिटी खड़ी कर पाते। गरीबी को अमीरी कहने लगेंगे तो क्या फर्क पड़ जाएगा। गांधी जी ने दलितों के उत्थान के लिए एक खास शब्द का प्रयोग किया था, लेकिन आज वही शब्द अपराध की श्रेणी में है। नामों के बदलाव का कोई खास फर्क नहीं है।



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राजस्थान में बहुत सारे शहर और गांव हैं, जिनके नाम बदले जाने चाहिए। इसके अलावा नाम बदलने से यदि इतिहास दुरुस्त होता हो तो भी फायदा है। मसलन ‘हिंदू’ शब्द को कैसे बदलोगे तो मूल रूप से फारसी शब्द है। इसलिए बीजेपी वाले आज कल सनातन शब्द का इस्तेमाल करने लगे हैं। नामों के बदलाव का अर्थ तब होता है, जब वह किसी के विचार को प्रभावित करे।
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वहीं, वरिष्ठ पत्रकार मनीष गोधा का मानना है कि भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में स्थानों के नाम बदलना दल की मूल राजनीति का हिस्सा है, जिससे उसकी हिंदूवादी छवि को मजबूती मिलती है। उनके अनुसार यह कदम पार्टी के पारंपरिक मतदाताओं को एकजुट रखने में सहायक हो सकता है, लेकिन इसे अनावश्यक व्यय और पहचान की राजनीति के रूप में भी देखा जाता है।
 
सियासी नफा-नुकसान: राजनीतिक दृष्टि से ऐसे निर्णयों के लाभ और हानि, दोनों पहलू हैं। इतिहास और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर नाम परिवर्तन को कुछ लोग उचित ठहराते हैं, जबकि अन्य इसे प्रतीकात्मक राजनीति मानते हैं। उल्लेखनीय है कि कई स्थानों के आधिकारिक नाम बदल जाने के बाद भी आम बोलचाल में लोग प्रायः पुराने नाम ही प्रयोग करते रहते हैं।

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