जयपुर डायलॉग्स अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में एक बार फिर जयपुर में आयोजित होने जा रहा है। इस बार कार्यक्रम की थीम ‘बैटल फॉर इंडिया’ रखी गई है। आयोजन में देश-विदेश के कई प्रमुख वक्ताओं के शामिल होने की संभावना है। जयपुर डायलॉग्स के संस्थापक और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी संजय दीक्षित ने अमर उजाला से खास बातचीत में मंच की स्थापना, उसके उद्देश्यों और राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी।
दीक्षित ने बताया कि जयपुर डायलॉग्स की शुरुआत एक अन्य संवाद कार्यक्रम के अनुभव के बाद हुई। उनके मुताबिक, वहां उन्हें लगा कि एक खास विचारधारा से जुड़े लोगों को ही मंच पर प्रमुखता दी जाती है, जबकि दूसरी विचारधारा के लोगों के प्रति उपेक्षा का रवैया अपनाया जाता है। इसी अनुभव के बाद उन्होंने ऐसा मंच बनाने का विचार किया, जहां अलग-अलग विचार रखने वाले लोगों को अपनी बात रखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अवसर मिल सके।
‘डायलॉग्स नहीं, मोनोलॉग’ के आरोपों पर क्या बोले दीक्षित?
दीक्षित ने कांग्रेस सांसद शशि थरूर का उदाहरण देते हुए कहा कि उनसे लगातार बातचीत होती रही थी। उनके अनुसार, थरूर ने अंतिम समय में पार्टी के काम से बेंगलुरु जाने की बात कहकर जयपुर आने में असमर्थता जताई थी। दीक्षित ने दावा किया कि उसी शाम थरूर बेंगलुरु लिटरेचर फेस्टिवल में भाषण देते नजर आए। उन्होंने कहा कि जयपुर डायलॉग्स के मंच से दूरी बनाए रखने की वजह संबंधित लोग ही बेहतर बता सकते हैं।
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‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की अवधारणा पर उठाए सवाल
महात्मा गांधी के योगदान पर दीक्षित का बड़ा दावा
महात्मा गांधी के योगदान को लेकर भी दीक्षित ने विवादित दावा किया। उन्होंने कहा कि देश की आजादी में गांधी का योगदान नहीं था। अपने दावे के समर्थन में उन्होंने 1956 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली के कलकत्ता दौरे से जुड़ा चर्चित प्रसंग सुनाया। दीक्षित के अनुसार, जब एटली से भारत को निर्धारित समय से पहले आजादी मिलने का कारण पूछा गया तो उन्होंने आजाद हिंद फौज और सुभाष चंद्र बोस को इसकी प्रमुख वजह बताया। गांधी के योगदान के बारे में पूछे जाने पर एटली के कथित जवाब को दीक्षित ने ‘मिनिमल’ बताया।
‘राष्ट्रवाद का महाकुंभ है जयपुर डायलॉग्स’
दीक्षित ने कहा कि वह तथ्यों और सबूतों के आधार पर बात करना पसंद करते हैं और इसी वजह से कई बार लोग उनसे दूरी बना लेते हैं। उन्होंने जयपुर डायलॉग्स को साहित्य का महाकुंभ नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रवाद का महाकुंभ’ बताया। उनके मुताबिक, साहित्य के मंच के लिए विचार पर्याप्त हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रवाद के मंच से जुड़ने के लिए मन, कर्म और विचार, तीनों की आवश्यकता होती है।