भाजपा के स्थापना दिवस के मंच से वसुंधरा राजे ने संगठन की अंदरूनी राजनीति पर सीधे निशाना साधते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि आने वाले समय में पार्टी के भीतर पहचान और अवसर “विचारधारा और समर्पण” के आधार पर तय होने चाहिए, न कि दल बदलकर आए नेताओं के आधार पर।
राजे ने बिना नाम लिए उन नेताओं पर तीखा कटाक्ष किया जो बार-बार दल बदलते रहे हैं। उन्होंने कहा कि “कुछ लोग दल तो बदल लेते हैं, लेकिन उनकी सोच नहीं बदलती”, जबकि असली कार्यकर्ता वे हैं जो संगठन में “दूध में शक्कर” की तरह घुल-मिल जाते हैं।
राजे का यह बयान ऐसे समय आया है जब पार्टी के भीतर राजनीतिक नियुक्तियों और पदों को लेकर खींचतान की चर्चाएं तेज हैं। राजे ने साफ संकेत दिए कि अब प्राथमिकता उन कार्यकर्ताओं को मिलनी चाहिए, जिन्होंने वर्षों तक पार्टी के लिए संघर्ष किया है, न कि अवसर देखकर शामिल होने वालों को।
राजे ने संगठन को आगाह करते हुए कहा कि पार्टी के लिए सबसे बड़ा खतरा बाहरी विपक्ष नहीं, बल्कि अंदर मौजूद स्वार्थी प्रवृत्तियां हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोग संगठन से ज्यादा अपने हितों को प्राथमिकता देते हैं, जो लंबे समय में पार्टी को कमजोर कर सकते हैं।
कार्यकर्ताओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि पद के पीछे मत भागो, काम करो। काम करोगे तो पद खुद आपके पास आएगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने उनकी मां विजया राजे सिंधिया को पार्टी की कमान सौंपनी चाही थी, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया था।