राजधानी जयपुर में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के तहत कई कदम उठाए हैं लेकिन बढ़ता प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण के कारण श्वसन संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं और इससे लोगों की औसत आयु पर भी असर पड़ रहा है। वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा ने बताया कि जयपुर में वर्ष 2017-18 को आधार वर्ष मानते हुए 2025-26 तक PM 10 स्तर में 40 प्रतिशत तक कमी लाने का लक्ष्य तय किया गया है। इसके लिए शहर में छह निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्र के माध्यम से प्रदूषण के स्तर की लगातार निगरानी की जा रही है।
आईआईटी कानपुर द्वारा किए गए अध्ययन में जयपुर में प्रदूषण के प्रमुख स्रोत सड़क और निर्माण कार्य से उड़ने वाली धूल, वाहनों से होने वाला उत्सर्जन, औद्योगिक उत्सर्जन, ठोस कचरे का जलना और डीजल जनरेटर बताए गए हैं। इन स्रोतों को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकार ने शहर स्तर पर एक कार्ययोजना तैयार की है, जिसमें परिवहन विभाग, नगरीय निकाय, नगरीय विकास विभाग, उद्योग विभाग, पुलिस और राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जिम्मेदारियां तय की गई हैं।
सरकार के अनुसार 15वें वित्त आयोग के तहत केंद्र सरकार से जयपुर को अब तक 344.70 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं। इस राशि का उपयोग सड़कों की मरम्मत और मजबूती, निर्माण गतिविधियों के नियमन, बायोफ्यूल जलाने से होने वाले उत्सर्जन को कम करने और जनजागरूकता अभियान चलाने में किया गया है। इसके अलावा शहर में 21.7 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वृक्षारोपण और ग्रीन बेल्ट भी विकसित किए गए हैं।
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स्वास्थ्य पर बढ़ता असर
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण का असर लोगों के स्वास्थ्य पर तेजी से दिखाई दे रहा है। देश में लगभग 13 प्रतिशत मौतें श्वसन रोगों के कारण होती हैं, जबकि राजस्थान में क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) से होने वाली मौतों की संख्या सबसे अधिक बताई जाती है। वाहनों की बढ़ती संख्या, धूल प्रदूषण और युवाओं में धूम्रपान की बढ़ती प्रवृत्ति इन बीमारियों के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार भारत में पुरुषों में सीओपीडी की दर लगभग 7.4 प्रतिशत है।
बच्चों और बुजुर्गों पर ज्यादा असर
विशेषज्ञों के अनुसार प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ता है क्योंकि उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है। इससे बच्चों में फेफड़ों के विकास पर असर पड़ सकता है, जबकि बुजुर्गों में हृदय रोग, स्ट्रोक, अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदूषण से निपटने के लिए सरकारी योजनाओं के साथ-साथ जनजागरूकता और जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी है, तभी वायु प्रदूषण के बढ़ते खतरे और उससे जुड़ी बीमारियों पर प्रभावी नियंत्रण संभव हो सकेगा।