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Jaipur: 'चीखें आज भी सुनाई देती हैं', विभाजन का दर्द बयां कर भावुक हुए श्याम धवन, बोले- उम्मीद लेकर आए थे भारत

Tue, 21 Jul 2026 04:49 PM IST
जयपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

जयपुर निवासी श्याम धवन ने 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान पेशावर से भारत आने की अपनी दर्दनाक यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि महज 11 साल की उम्र में उन्होंने ट्रेन यात्रा के दौरान हिंसा, हमलों और लोगों की चीखें अपनी आंखों से देखीं।
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1947 के विभाजन का दर्द बयां कर भावुक हुए श्याम धवन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भारत-पाकिस्तान विभाजन को लगभग 80 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन 1947 की त्रासदी की टीस आज भी लाखों लोगों के दिलों में जिंदा है। उस दौर की भयावह यादों को अपनी आंखों से देखने वाले 90 वर्षीय श्याम धवन ने अब अपने जीवन के सबसे दर्दनाक अध्याय को किताब'की-होल टू स्कार्स' के रूप में दुनिया के सामने रखा है। इस पुस्तक में उन्होंने पेशावर से भारत तक के दर्दनाक सफर, विस्थापन की पीड़ा, बंटवारे के खौफनाक मंजर और संघर्ष से भरी नई जिंदगी की शुरुआत को अपनी आपबीती के रूप में दर्ज किया है। यह किताब केवल इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि विभाजन की मानवीय त्रासदी और उम्मीद की कहानी को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक प्रयास भी है।
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पेशावर से दिल्ली तक का सफर बना जिंदगी का सबसे कठिन दौर

श्याम धवन ने बताया कि पेशावर से दिल्ली के लिए रवाना हुई ट्रेन का सफर उनकी जिंदगी का सबसे कठिन दौर था। जैसे ही ट्रेन आगे बढ़ी, यात्रियों के बीच सन्नाटा छा गया। हर कोई सुरक्षित भारत पहुंचने की उम्मीद में सफर कर रहा था, लेकिन रास्ते में हालात बेहद भयावह हो गए। उन्होंने बताया कि ट्रेन की खिड़की के छोटे से छेद से बाहर देखा तो हथियारों से लैस लोगों की भीड़ नजर आई। उनकी बोगी में मौजूद छह सिख यात्रियों ने कृपाण लेकर दरवाजे पर मोर्चा संभाल लिया। वहीं, उनके अंकल के पास रिवॉल्वर होने के कारण हमलावर उस डिब्बे में प्रवेश नहीं कर सके। हालांकि, ट्रेन की छत पर बैठे कई लोगों पर हमला हुआ और उनकी चीखें आज भी उन्हें विचलित कर देती हैं।
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अमृतसर में मिला सहारा, स्वयंसेवकों ने दिया भोजन और दूध

श्याम धवन ने बताया कि अमृतसर पहुंचने पर स्वर्ण मंदिर के स्वयंसेवकों ने शरणार्थियों को भोजन और दूध उपलब्ध कराया। उस कठिन समय में मिली यह मदद उनके परिवार के लिए नई उम्मीद लेकर आई। उन्होंने कहा कि लोग अक्सर उनसे पूछते हैं कि वे पाकिस्तान में क्या छोड़ आए, लेकिन उनका जवाब हमेशा यही होता है कि वे अपने साथ उम्मीद, आत्मविश्वास और संघर्ष का साहस लेकर आए थे।
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'नफरत को वहीं दफना दिया, भारत में नई शुरुआत की'

श्याम धवन का मानना है कि नफरत को अपने साथ लेकर चलने से जख्म कभी नहीं भरते। इसलिए उन्होंने नफरत को वहीं दफना दिया और भारत में नई जिंदगी की शुरुआत प्रेम, विश्वास और सकारात्मक सोच के साथ की।

बेटे विक्रम धवन बोले- माता-पिता ने कभी नफरत नहीं सिखाई

श्याम धवन के बेटे विक्रम धवन ने बताया कि उनके माता-पिता ने कभी विभाजन की त्रासदी को अगली पीढ़ी के मन में नफरत के रूप में नहीं आने दिया। उन्होंने हमेशा यही सिखाया कि धर्म और जाति से पहले देश और इंसानियत सबसे बड़ी पहचान है। परिवार में देशप्रेम, सामाजिक सौहार्द और सकारात्मक सोच की शिक्षा दी गई। विक्रम के अनुसार, उनके माता-पिता ने अतीत के दर्द को याद जरूर रखा, लेकिन उसे भविष्य की राह में कभी बाधा नहीं बनने दिया।
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