पूर्व महापौर अशोक लाहोटी ने 2018 में सांगानेर से विधानसभा चुनाव जीता। पार्षद रहे मानसिंह भी 2013 में परबतसर से विधायक चुने गए। इन उदाहरणों से यह जरूर दिखता है कि जयपुर की निकाय राजनीति ने कुछ नेताओं को विधानसभा तक पहुंचने के लिए जरूरी राजनीतिक जमीन उपलब्ध कराई।
उदयपुर में भी दिखी यही सियासी सीढ़ी
उदयपुर की स्थानीय राजनीति से भी कई नेता आगे बढ़े। भानु कुमार शास्त्री पार्षद रहने के बाद विधायक और सांसद बने। किरण माहेश्वरी नगर परिषद की सभापति से आगे बढ़ीं और सांसद बनने के साथ राजसमंद से तीन बार विधायक रहीं। वे राज्य सरकार में मंत्री भी रहीं। फूल सिंह मीणा ने पार्षद के रूप में शुरुआत की और उदयपुर ग्रामीण से लगातार तीन बार विधायक चुने गए। कांग्रेस के त्रिलोक पूर्बिया और भाजपा के ताराचंद जैन भी स्थानीय निकाय की राजनीति से विधानसभा तक पहुंचे।
कांग्रेस में भी निकाय से विधानसभा का रास्ता
यह कहानी सिर्फ भाजपा तक सीमित नहीं है। कांग्रेस की पुष्पा शर्मा अलवर नगर परिषद की पार्षद रहीं और 1985 में विधायक चुनी गईं। मनीषा पंवार जोधपुर नगर निगम की पार्षद रहने के बाद 2018 में विधानसभा पहुंचीं। नोहर नगर पालिका के अध्यक्ष रहे अमित चाचान बाद में विधानसभा के लिए चुने गए। बीकानेर के गोपाल जोशी पार्षद और सभापति रहने के बाद विधायक बने और तीन बार विधानसभा पहुंचे।
अजमेर की अनिता भदेल ने भी स्थानीय निकाय से राजनीतिक सफर शुरू किया। वे 2003 से 2023 तक लगातार पांच विधानसभा चुनावों में अजमेर दक्षिण का प्रतिनिधित्व करने में सफल रहीं।
कई चेहरे विधानसभा तक पहुंचे, लेकिन जीत दर्ज नहीं कर पाए
निकाय की राजनीति से पहचान बनाने के बाद कई नेताओं को विधानसभा चुनाव लड़ने का मौका मिला। शील धाबाई, विक्रम सिंह शेखावत और अर्चना शर्मा जैसे नाम इसी कड़ी में आते हैं। उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन जीत उनके खाते में दर्ज नहीं हो सकी। पूर्व जयपुर महापौर ज्योति खंडेलवाल ने महापौर बनने के बाद लोकसभा चुनाव भी लड़ा। 2019 में जयपुर से मैदान में उतरीं, लेकिन संसद तक पहुंचने का मौका नहीं मिल पाया। बाद में उन्होंने भाजपा का दामन थामा और अब फिर निकाय चुनाव के मैदान में हैं।