फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Rajasthan News: रेगिस्तान का ‘आक’ बना किसानों की आय का नया सहारा, गर्म कपड़ों के लिए बन रहा प्राकृतिक रेशा

Mon, 18 May 2026 06:20 PM IST
जयपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

कभी बेकार खरपतवार माना जाने वाला आक का पौधा अब ग्रामीणों और महिलाओं के लिए कमाई का नया सहारा बन गया है। यह अपने प्राकृतिक रेशों के जरिए रोजगार, गर्म कपड़ों के निर्माण और महिलाओं की आर्थिक सशक्तिकरण का माध्यम बन रहा है।
विज्ञापन
आक के फलों से बन रहा प्राकृतिक रेशा - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

राजस्थान के थार रेगिस्तान में बंजर और रेतीली जमीन पर उगने वाला आक (कैलोट्रोपिस गिगेंटिया) अब ग्रामीणों के लिए रोजगार और कमाई का मजबूत जरिया बनता जा रहा है। जिसे कभी खरपतवार समझकर हटाया जाता था, वही पौधा अब आक से आमदनी अभियान के जरिए किसानों और महिलाओं की आर्थिक स्थिति बदल रहा है। यह पहल रूमादेवी फाउंडेशन और निट्रा (उत्तर भारत वस्त्र अनुसंधान संघ) द्वारा संयुक्त रूप से संचालित की जा रही है।
विज्ञापन


निट्रा के निदेशक डॉ. के.के. परमार के अनुसार आक के पोड्स से निकलने वाले प्राकृतिक रेशों का उपयोग बैग, जैकेट, शॉल, स्वेटर और अन्य गर्म कपड़ों के निर्माण में किया जा रहा है। इन रेशों से बने उत्पाद बेहद हल्के होने के साथ-साथ अत्यधिक ठंड में भी शरीर को गर्म रखने में सक्षम हैं। विशेषज्ञों का दावा है कि ये वस्त्र माइनस 20 से 40 डिग्री तापमान तक प्रभावी साबित हो सकते हैं।

विज्ञापन


ये भी पढ़ें: Jodhpur: काले हिरण केस में हाईकोर्ट में हुई सुनवाई, सलमान समेत सभी आरोपियों को राहत, 13 जुलाई को अगली तारीख

रूमा देवी ने बताया कि आक का पौधा एक बार लगाने के बाद लगभग 10 से 12 वर्षों तक लगातार पोड्स देता है। इसकी खास बात यह है कि इसे सिंचाई या विशेष देखभाल की जरूरत नहीं होती और यह बंजर भूमि में भी आसानी से उग जाता है। यही कारण है कि अब किसान इसकी व्यावसायिक खेती की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
विज्ञापन


बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर, नागौर, बीकानेर, अजमेर, झुंझुनू और श्रीगंगानगर सहित कई जिलों में महिलाएं आक के पोड्स एकत्रित कर रेशे निकालने का कार्य कर रही हैं। रूमादेवी फाउंडेशन गांव-गांव जाकर स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण भी दे रहा है। महिलाओं को केवल पके हुए पोड्स तोड़ने और उन्हें जालीदार कट्टों में सुरक्षित रखने की सलाह दी जा रही है ताकि रेशों की गुणवत्ता बनी रहे।

यह पहल पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आक एक सूखा सहनशील पौधा है, जो मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करता है। प्राकृतिक रेशों से बने उत्पादों की मांग देश और विदेश में लगातार बढ़ रही है। फाउंडेशन अब तक 500 टन से अधिक रेशे संग्रहित करने की क्षमता विकसित कर चुका है और आने वाले समय में इसे और विस्तार देने की योजना पर काम कर रहा है।

 

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें