राजस्थान के थार में रहने वाला रहस्यमयी शिकारी ‘कैरेकल’ (स्यागोश) अब वैज्ञानिकों की निगरानी में है। राजस्थान वन विभाग ने इस दुर्लभ जंगली बिल्ली के व्यवहार और गतिविधियों को समझने के लिए रेडियो कॉलरिंग और कैमरा ट्रैप के जरिए बड़ा अध्ययन शुरू किया है।
मुख्य वन संरक्षक (जोधपुर) अनूप केआर के मुताबिक, कैरेकल एक अकेले रहने वाला शिकारी है, जो झाड़ियों में छिपकर शिकार करता है और बेहद कम नजर आता है। यही वजह है कि इसके मूवमेंट और आदतों को समझना अब तक चुनौती बना हुआ था।
हाल ही में हुए एक चौंकाने वाले खुलासे ने इस रिसर्च को और अहम बना दिया है। एक रेडियो-कॉलर लगे कैरेकल ने कई भेड़ों के साथ एक चिंकारा का भी शिकार किया, जबकि पहले इसे सिर्फ छोटे जीवों का शिकारी माना जाता था। इससे साफ हुआ कि यह शिकारी अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा ताकतवर है।
सीमावर्ती इलाकों में मवेशियों के शिकार से ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ी है और कुछ मामलों में बदले की कार्रवाई भी सामने आई है। इसे देखते हुए वन विभाग ने लोगों से अपील की है कि वे जानवर को नुकसान न पहुंचाएं और सूचना दें, जिस पर मुआवजा भी दिया जा रहा है। प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार, शाहगढ़-गोथारू-किशनगढ़ बेल्ट में करीब 30-40 कैरेकल मौजूद हैं। भारत-पाक सीमा के पास स्थित यह संवेदनशील इलाका बीएसएफ के नियंत्रण में है, जिससे रिसर्च और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है।
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वन विभाग कैमरा ट्रैप, सैंपल एनालिसिस और रेडियो कॉलरिंग के जरिए कैरेकल के रहन-सहन, खानपान और मूवमेंट पैटर्न को समझने में जुटा है। इससे इसके होम रेंज और व्यवहार से जुड़े कई अहम राज खुलने की उम्मीद है। इसी बीच जैसलमेर के शाहगढ़ इलाके में एक कैरेकल की हत्या और उसे जलाने का वीडियो वायरल होने से हड़कंप मच गया। इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और उनके खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत कार्रवाई की जा रही है।
भारत में संकटग्रस्त मानी जाने वाली यह प्रजाति थार मरुस्थल और राजस्थान के सीमित इलाकों में ही पाई जाती है। ‘रेगिस्तान का छोटा चीता’ कहे जाने वाले कैरेकल की खासियत इसकी लंबी काली झबरीली कान और जबरदस्त छलांग है, जो इसे हवा में ही शिकार पकड़ने की ताकत देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह अध्ययन सफल रहा, तो देश के अन्य हिस्सों में भी कैरेकल संरक्षण के ऐसे ही मॉडल लागू किए जा सकते हैं।