राजस्थान एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) की जांच में जयपुर निवासी बबीता धाकड़ उर्फ खदीजा का मोबाइल फोन उसके पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से संपर्कों के राज एक-एक कर खोल रहा है।
पहचान छिपाने के लिए चैट डिलीट की
जानकारी में सामने आया है कि महिला ने आतंकियों के साथ हुई चैट, फोटो और वीडियो सहित कई डिजिटल साक्ष्यों को अपनी पहचान छिपाने के उद्देश्य से डिलीट किया और सोशल मीडिया पर फर्जी नामों से भी अकाउंट संचालित किए।
प्रारंभिक जांच में कई ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट भी सामने आए, जिन पर जैश-ए-मोहम्मद के झंडे, हथियारों के साथ तस्वीरें, उग्रवादी विचारधारा से जुड़ी सामग्री और संदिग्ध पोस्ट साझा की गई थीं। एजेंसी को महिला के फेसबुक मैसेंजर में Uzma Jaan, Kuran Let और Abu Suleman नामक प्रोफाइलों से संवाद के संकेत भी मिले हैं।
मोबाइल में 92 पाकिस्तानी नंबर मिले
जांच में यह भी सामने आया कि महिला के मोबाइल में सामान्य व्हाट्सएप के साथ बिजनेस व्हाट्सएप भी सक्रिय था। एजेंसी को कई पाकिस्तानी और अफगानिस्तानी मोबाइल नंबरों के साथ चैट, कॉल और मिस्ड कॉल के रिकॉर्ड मिले हैं। एटीएस के मुताबिक महिला की कॉन्टैक्ट लिस्ट में करीब 92 पाकिस्तानी नंबर सेव थे और कुल मिलाकर लगभग 300 संपर्क दर्ज थे।
जांच एजेंसियों के अनुसार इन नंबरों में से एक का संबंध कथित रूप से जैश-ए-मोहम्मद के कमांडर कारी जरार से और दूसरे का संबंध संगठन के संस्थापक मसूद अजहर के रिश्तेदार यूसुफ अजहर उर्फ उस्ताद गौरी से होने की आशंका है। दोनों नाम पहले से कई आतंकी मामलों में जांच एजेंसियों के रिकॉर्ड में दर्ज हैं।
ऑनलाइन कनवर्जन की बात कही
जांच अधिकारियों के अनुसार महिला पाकिस्तान जाकर अबू-उबैदाह से विवाह करना चाहती थी। इसके लिए नेपाल, सऊदी अरब या संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के रास्ते पाकिस्तान पहुंचने की योजना पर चर्चा होने के संकेत मिले हैं। एटीएस को यह भी जानकारी मिली है कि यात्रा खर्च के लिए क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल की बात हुई थी। इसी क्रम में महिला द्वारा पासपोर्ट, वीजा और क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित जानकारियां ऑनलाइन खोजने तथा कुछ एप्लीकेशन डाउनलोड करने की जानकारी भी सामने आई है।
जांच में यह आरोप भी सामने आया है कि महिला ने अपने तीन भारतीय मोबाइल नंबरों के व्हाट्सएप ओटीपी कथित रूप से अबू-उबैदाह के साथ साझा किए थे। एजेंसियां इस पहलू की जांच कर रही हैं कि कहीं इन नंबरों का उपयोग भारत में पहचान छिपाकर डिजिटल संचार के लिए तो नहीं किया गया।