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Rajasthan: एक केस, 20 जांच अधिकारी, 11 साल बाद भी चार्जशीट नहीं; VIP ड्यूटी का बहाना, जानें क्या है मामला?

Sat, 28 Mar 2026 01:25 PM IST
जयपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

Rajasthan: जयपुर के 2014 के एक जमीन फर्जीवाड़ा मामले में 11 साल तक चार्जशीट दाखिल नहीं होने पर राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए इसे न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बताया। कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए जांच और कानून-व्यवस्था विंग को अलग करने के निर्देश दिए।
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राजस्थान हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जयपुर के प्रतापनगर थाने में दर्ज एक एफआईआर में 11 साल तक चार्जशीट दाखिल नहीं होने पर राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने इस मामले को केवल लापरवाही नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की नींव को कमजोर करने वाला बताया।

2014 में दर्ज हुई थी FIR

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यह मामला वर्ष 2014 में दर्ज हुआ था, जिसमें जमीन से जुड़े फर्जीवाड़े, जालसाजी और साजिश जैसे गंभीर आरोप लगाए गए थे। आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 474 और 120-बी के तहत केस दर्ज हुआ, लेकिन 2026 तक भी जांच पूरी नहीं हो सकी। हैरानी की बात यह रही कि इस दौरान 20 से अधिक जांच अधिकारी बदले गए, फिर भी चार्जशीट दाखिल नहीं हुई।

पुलिसवालों ने दिया VIP ड्यूटी का हवाला
सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच अधिकारी से देरी का कारण पूछा, जिस पर उसने बताया कि वह विधानसभा सत्र, त्योहारों (होली, ईद, महाशिवरात्रि), आईपीएल मैच और वीआईपी ड्यूटी में व्यस्त था। इस जवाब को अदालत ने अस्वीकार्य बताते हुए कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि बार-बार समय-सीमा तय करने के बावजूद आदेशों की अवहेलना की गई। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि एफआईआर में संज्ञेय अपराध बनता है, इसलिए इसे रद्द नहीं किया जा सकता।

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'जनता का भरोसा होता है कमजोर'
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि जांच में देरी से न केवल पीड़ित, बल्कि आरोपी के अधिकारों का भी हनन होता है और इससे पुलिस की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ता है। अदालत ने माना कि इस तरह की स्थिति से न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर होता है।

कोर्ट ने दिया सख्त आदेश
इस मामले को सिस्टम की खामी मानते हुए कोर्ट ने बड़ा सुधारात्मक आदेश दिया। राज्य सरकार को निर्देश दिए गए कि जांच (इन्वेस्टिगेशन विंग) और कानून-व्यवस्था (लॉ एंड ऑर्डर विंग) को अलग किया जाए। यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरे प्रदेश में लागू की जाए, ताकि जांच की गुणवत्ता सुधरे और मामलों का समय पर निस्तारण हो सके। अदालत ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस सुधार लंबे समय से लंबित हैं और अब इन्हें लागू करना आवश्यक है।

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'हाईकोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य'
फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए एएजी मेजर आर. पी. पी. सिंह ने कहा कि पूर्व में सुप्रीम कोर्ट भी इस तरह के स्तरीय फैसले दे चुका है और हाईकोर्ट का यह निर्णय स्वागत योग्य है। उन्होंने कहा कि इससे लॉ एंड ऑर्डर की स्थिति बेहतर होगी और आमजन को त्वरित न्याय व सुविधा मिल सकेगी। उन्होंने यह भी दोहराया कि जांच में देरी से पीड़ित और आरोपी दोनों के अधिकार प्रभावित होते हैं, इसलिए इस तरह के सुधार आवश्यक हैं। 

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